केंद्र सरकार सिविल सर्विस परीक्षा में सफल छात्रों को कैडर और सर्विस बांटने की प्रक्रिया में बदलाव चाहती है। लेकिन इसे लेकर उसकी पहल पर मच गया है घमासान। आखिर क्यों? 

रईस अहमद ‘लाली’

संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी एक बार फिर सुर्खियों में है। ​लेकिन इस बार वह अपनी तरफ से किसी पहल को लेकर चर्चा में नहीं है, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार के एक प्रस्ताव ने उसे बहस के दायरे में ला खड़ा किया है। प्रस्ताव है वर्षों पुराने उस सिस्टम में बदलाव का, जिसके तहत यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा में सफल छात्रों को कैडर और सर्विस आवंटित यानी अलॉट किया जाता है।

प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ की तरफ से 17 मई को संघ लोग सेवा आयोग (यूपीएससी) को एक पत्र लिखकर फाउंडेशन कोर्स के नंबरों के आधार पर चयनित आवेदकों को कैडर देने का सुझाव दिया गया है। अभी तक यूपीएससी की परीक्षा में अंकों के आधार पर सफल आवेदकों को आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस या दूसरे कैडर आवंटित होते थे। कैडर आवंटित होने के बाद आईएएस और आईएफएस छात्रों को लाल बहादुर शास्त्री अकादमी, मसूरी में तथा दूसरे सफल छात्रों को मसूरी, हैदराबाद व भोपाल के संस्थानों में तीन महीने का फाउंडेशन कोर्स करना होता है। अब प्रधानमंत्री कार्यालय का कहना है कि फाउंडेशन कोर्स के नंबरों के आधार पर चयनित आवेदकों को कैडर मिले यानी यूपीएससी की परीक्षा में ज्यादा नंबर पाने या टॉप करने के बावजूद ये निश्चित नहीं होगा कि आप आईएएस या आईपीएस बनेंगे, बल्कि फाउंडेशन कोर्स में मिले नंबर से कैडर अलॉट होगा।

सरकार का मानना है कि सिविल सेवा परीक्षा में सफल छात्रों के लिए नौकरी और कैडर चुनने में किताबी ज्ञान के बजाय व्यवहारिक ज्ञान को ज्यादा उपयुक्त मानक माना जाना चाहिए। जमीनी ज्ञान की जांच से ही यह तय किया जा सकता है कि कौन किस सेवा में जाने लायक है। मोदी सरकार की मंशा है कि देश के नये आईएएस अधिकारी ट्रेनिंग में किताबी ज्ञान से अधिक व्यवहारिक दुनिया को समझें। आइडिया आॅफ इंडिया को हकीकत की दुनिया से समझें और जानें। पॉलिटिकल सिस्टम और इसके गवर्नेंस पर प्रभाव को जानें।

जितेन्द्र सिंह, कार्मिक राज्यमंत्री

सरकार के इस सुझाव और प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर पहल करते हुए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने बाकायदा इस सिस्टम को लागू करने के लिए तमाम पक्षों से राय भी मांग ली है। डीओपीटी ने सभी कैडर कंट्रोलिंग मंत्रालयों को पत्र लिखकर राय मांगी है कि क्या चयनित सदस्यों के सेवा और कैडर का आंवटन सिविल सेवा में प्राप्त अंक के आधार के बदले तीन माह के फाउंडेशन कोर्स के प्रदर्शन के आधार पर किया जा सकता है? कहा तो यहां तक जा रहा है कि सरकार का इरादा इस सिस्टम को इसी साल से लागू कर देने का है। यही वजह है कि सरकार की इस मंशा पर विरोधी दल ही नहीं, सिविल सर्विस परीक्षा पास करने वाले छात्र और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी गंभीर सवाल उठा रहे हैं, इस कदम का विरोध कर रहे हैं।

राहुल गांधी, अध्यक्ष, कांग्रेस

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार की योजना मेरिट सूची में दखल देकर अपनी इच्छानुसार अधिकारियों की निुयक्ति करना है। उन्होंने ‘बाय बाय यूपीएससी’ हैशटैग के साथ ट्वीट किया है कि ‘छात्रों! उठ खड़े हो, आपका भविष्य खतरे में है। आरएसएस वह हथियाना चाहता है, जिस पर आपका अधिकार है।इस पत्र से खुलासा होता है कि प्रधानमंत्री परीक्षा की रैंकिंग के बजाय योग्यता सूची में छेड़छाड़ कर केंद्रीय सेवाओं में आरएसएस की पसंद के अधिकारियों की नियुक्ति करना चाहते हैं। ‘उनकी पार्टी तो इसे एक बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है। संभव है कि आने वाले दिनों में इसे तूल देकर छात्रों को इससे जोड़ने की कोशिश की जाए।

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला का कहना है कि ‘मोदी जी एक ऐसा खतरनाक प्रस्ताव सामने लाये हैं जो अखिल भारतीय सिविल सेवा की मेरिट को ही खत्म कर देगा। मोदी का मतलब ‘मेन सब्जेक्ट टू डिस्ट्रॉयइंस्टीट्यूशंस’ है।’

सरकार द्वारा सिविल सेवा परीक्षा के सिस्टम में बदलाव के प्रयासों को राजनीतिक हलकों से इतर नौकरशाहों-छात्रों का समुदाय भी अनुचित मान रहा है। उनकी चिंता है कि जबकैडर और सेवा तय करने का पैमाना फाउंडेशन कोर्स होगा, तो इसमें चंद लोगों के हाथ में यह शक्ति होगी और इसके दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ेगी। कुछ लोग इसे मनमाफिक नौकरशाही की फौज खड़ा करने का प्रयास भी बता रहे हैं। वे राहुल गांधी की आशंका से भी इत्तेफाक रखते हैं कि यह कदम आरएसएस के लोगों को उपकृत कर भविष्य में अपने वफादार नौकरशाह तैयार करना है। वे आरएसएस से नजदीकी रखने वाले संकल्प कोचिंग सेंटर का उदाहरण दे रहे हैं, जिसके देश भर में खुले केंद्रों में कई मौजूदा और भूतपूर्व नौकरशाह लगातार लेक्चर देने जाते हैं। बहरहाल, मौजूदा समय में सिविल सेवा परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर मेरिट सूची बनती है और उसी के अनुसार पारदर्शी तरीके से कैडर और सर्विस का अलॉटमेंट होता है। टॉपर को सामान्यतया आईएएस और बड़े राज्य कैडर के रूप में मिलते हैं। आईपीएस, आईएफएस के अलावा केंद्रीय सेवाओं की ग्रेड ए नौकरी के लिए अधिकारी इस परीक्षा से चुने जाते हैं। इसके अलावा एक व्यवस्था के तहत ओबीसी, दलित और आदिवासी पृष्ठभूमि के सफल छात्रों को भी जायज अवसर मिल पाता है। तभी आशंका यह भी जताई जा रही है कि यह आरक्षण को कमजोर कर संबंधित वर्ग के छात्रों का अधिकार छीनने की कोशिश है।

कांग्रेस नेता अहमद पटेल कहते हैं, ‘इस प्रस्तावित कदम को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे ओबीसी, दलित और आदिवासी पृष्ठभूमि के सफल अभ्यर्थियों को पहले की तरह अवसर नहीं मिल पाएंगे। क्या यह आरक्षण की व्यवस्था को कमजोर करने का एक और प्रयास नहीं है?’ हालांकि इस कदम पर शुरू हुए विरोध से सकते में आयी सरकार अब यह सफाई दे रही है कि फिलहाल कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। कई तरह के प्रस्ताव हैं, जिन पर हर पक्ष से बात करने के बाद ही कोई फैसला किया जाएगा। कार्मिक राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह कहते हैं कि ‘यह फिलहाल एक सुझाव है, जिस पर सभी पक्षों के विचार मांगे गये हैं। यह मामला अभी भी परामर्श के चरण में है। इससे ज्यादा अभी कुछ भी नहीं है।’ 

बहरहाल, सरकार भले कुछ कहे लेकिन जिस तरीके से इसे आगे किया गया है, उससे लोगों को इस कदम में नौकरशाही को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश का संदेह भी नजर आ रहा है। यूपीएससी में जब एक-एक नंबर के लिए गला काट प्रतियोगिता से गुजरना पड़ता है, तो प्रैक्टिकल के नाम पर इतने नंबर एक शख्स के पास होना कहीं न कहीं पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। दलित संगठनों को भी इस बात का डर है कि कहीं जातिवाद के नाम पर दलित और सामान्य परिवारों के सफल आवेदकों से भेदभाव न हो।

गौरतलब है कि यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा तीन स्तरों में संपन्न होती है- प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार। इनमें प्राप्त अंकों के आधार पर ही हर साल आईएएस, आईपीएस, आईएफएस समेत 24 सेवाओं के लिए करीब एक हजार अधिकारियों का चयन होता है और उन्हें रैंक के आधार पर कैडर और सर्विस का आवंटन होता है। 

विनय सिंह, संस्थापक, ध्येय आईएएस

नयी व्यवस्था को लेकर हो रही पहल पर ध्येय आईएएस के संस्थापक विनय सिंह कहते हैं कि ‘ट्रेनिंग के अंक जोड़ने से उन सफल आवेदकों को इस मायने में भी नुकसान उठाना पड़ सकता है जो साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं, क्योंकि ट्रेनिंग वरिष्ठ नौकरशाहों की देखरेख में चलती है। ऐसे में प्रभावशाली और प्रशासनिक परिवार की पृष्ठिभूमि के सफलआवेदकों के साथ भाई-भतीजावाद की गुंजाइंश बची रह जाएगी जो फिलहाल अभी नहीं हो पाती है। कई सामान्य परिवार से आये वरिष्ठ नौकरशाह बताते हैं कि प्रशिक्षण संस्थान के डायरेक्टर पद पर बैठे लोगों के पास प्रैक्टिकल के नाम पर 150 नंबर तक देने का अधिकार होता है।’ 

हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय की सोच यह है कि एक बार यूपीएससी की परीक्षा में सफल होने के बाद सफल परीक्षार्थी फाउंडेशन कोर्स यानी ट्रेनिंग को गंभीरता से नहीं लेते। अगर फाउंडेशन कोर्स में परीक्षार्थी फेल भी हो जाए तो उसे दोबारा मौका मिलता है। कई बार परीक्षार्थी अपनी रैंक सुधारने के लिए फाउंडेशन कोर्स में शामिल ही नहीं होते हैं।

इससे प्रधानमंत्री कार्यालय को लगता है कि नौकरशाहों की बौद्धिक और कार्यशीलता की गुणवत्ता प्रभावित होती है। लेकिन कई दूसरे पहलुओं को प्रधानमंत्री कार्यालय या तो नजर-अंदाज कर रहा है या फिरउसे समझना नहीं चाहता है। मसलन नौकरशाहों की सारी ट्रेनिंग अंग्रेजी भाषा में होती है जिससे दूर-दराज और क्षेत्रीय भाषा से चयनित आवेदकों के पीछे रह जाने की संभावना है। उनके लिए आईएएस या आईपीएस कैडर मिलना मुश्किल होगा, क्योंकि वो यूपीएससी की परीक्षा अपने-अपने क्षेत्रीय भाषाओं में देकर सफल होते हैं। लिहाजा, सरकार भले ही इस बात को ध्यान मेंरखकर कैडर व सर्विस अलॉटमेंट में बदलाव करना चाह रही है कि मनचाहे कैडर व सर्विस के लिए सिविल सेवा निकालने वाले छात्रों को एक और परीक्षा से गुजरने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए, लेकिन उसे अपने इस प्रस्ताव में इस बात का भी ख्याल रखना होगा कि प्रक्रिया पादर्शी और वस्तुनिष्ठ हो। दूसरे तमाम पहलुओं पर भी बदलाव से पहले विचार किया जाना जरूरी है।

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ श्रीवास्तव कहते हैं, ‘ट्रेनिंग की गुणवत्ता रातोंरात निकले फरमान से नहीं सुधरने वाली है, बल्कि पहले ट्रेनिंग में पढ़ाई जाने वाली अध्ययन सामग्री का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद हो। सामान्य और दलित परिवारों से आने वाले सफल आवेदकों से भेदभाव न होने पाए, इसके लिए भी पर्याप्त उपाय होने चाहिए।’

बहरहाल सरकार द्वारा आॅल इंडिया सिविल सर्विसेज परीक्षा के जरिये चुने गये अफसरों को कैडर और सर्विस आवंटन प्रक्रिया में बदलाव की दिशा में की जा रही पहल ने राजनीतिक बवंडर तो मचा ही दिया है।

समाजवादी पार्टी नेता शिवपाल सिंह यादव

समाजवादी पार्टी नेता शिवपाल सिंह यादव ने कहा है कि ‘यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सर्विस की परीक्षा पहले से ही सर्वग्राही है। इसमें प्रारंभिक परीक्षा,मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार द्वारा विस्तृत पैमाने पर समग्र मूल्यांकन किया जाता है। वर्तमान प्रणाली अच्छी तरह से चल रही है और इसमें पक्षधरता की संभावना कम है। लेकिन सरकार के इस फैसले से डर और दबाव में रह रहे एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक वर्ग के मन में पक्षपात होने की आशंका है। मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि पूर्व की व्यवस्था, जिसमें सर्व वर्गों का विश्वास है, उसे बनाये रखें।’ देखना शेष है कि इस आग्रह पर सरकार का क्या रुख होता है। क्या वह अपने कदम पीछे खींचेगी या इस दिशा में उसकी पहल अंजाम तक पहुंचेगी? वैसे बदलाव की इस पहल को लेकर तमाम तरह की दिक्कतें हैं, तमाम तरह की शंकाएं।

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