कुछ वजह हैं कि महानगरों की तर्ज पर मध्यम आबादी वाले शहरों में शुरू हुआ होम स्कूलिंग ट्रेंड लोकप्रिय होने लगा है। ऐसे अभिवावकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय घर पर ही पसंदीदा विषयों की पढ़ाई करा रहे हैं। इससे पढ़ाई के खर्च के साथ-साथ बच्चों का वो समय भी बच रहा है जो रोजाना स्कूल आने-जाने में बर्बाद होता है, जबकि आरटीई एक्ट होमस्कूलिंग की राह में सबसे बड़ी बाधा बनता जा रहा है।

विकास पाण्डेय

होम स्कूलिंग का विकल्प

शिक्षा की निम्न गुणवत्ता का प्रभाव अब अभिभावकों पर भी पड़ने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में बहुत सारे पैरेंट्स ने अपने बच्चों के लिए होम स्कूलिंग के विकल्प को अपनाया है, क्योंकि परंपरागत स्कूलों की कई खामियों के कारण वे अपने बच्चों को वहां नहीं भेजना चाहते थे। उन्हें स्कूलों द्वारा बच्चों की समस्याओं को सुलझाने के बजाए उन्हें रट्टा लगाने पर जोर देकर पढ़ाने का तरीका, और बच्चों की अनुरूपता के लिए उनकी रचनात्मकता को पीछे छोड़ने का तरीका सही नहीं लगता है।

हासिल कर रहे कामयाबी की बुलंदी

सहल कौशिक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी ज्वाइंट एंटरेंस एग्जामिनेशन (आईआईटी जेईईई) की बेहद प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के छात्र हैं। वर्ष 2010 में उन्होंने महज 14 साल की छोटी सी उम्र में देशभर में 33वाँ और दिल्ली में पहला रैंक हासिल किया था। सहल ने किसी स्कूल में पढ़ाई नहीँ की थी। उन्होंने घर में ही पढ़ाई की थी।

कानपुर के रवि तिवारी ने पिछले साल ही दसवीं की परीक्षा पास की थी, उसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। पहले तो उसके माता-पिता बेचैन हो गये कि उसने ऐसा क्या किया लेकिन धीरे-धीरे उनको बाद समझ में आने लगी। असल में रवि को बचपन से ही मोबाइल को खिलौने की तरह खेलने का चस्का लग गया था। इस चस्के ने उसे मोबाइल ऐप का मास्टर बना दिया।

पिछले वर्ष इंदौर की 17 साल की होम स्कूलर मैत्रेयी गेहलोत को यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो द्वारा करीब सवा करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्रदान की गई। उसका सिलेक्शन न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में भी हो गया था। उसका छोटा भाई भी स्कूल जाने के बजाय फिल्म मेकिंग आर्ट सीख रहा है और उसके काम देखकर मुंबई की कई कंपनियां इस उम्र में ही उसे अपने साथ जोड़ने को उत्सुक हैं।

वैदेही व्यास

12 साल की ही वैदेही व्यास ने पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी है और अब वो पूरी तरह से पेंटिंग और योग पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। शहर में उसकी कलाकृतियों कीएक्जीबिशन भी लग चुकी है और उसने योग में अध्यापन करने का प्रशिक्षण भी पूरा कर लिया है।

ये चंद उदाहरण तो बानगी भर हैं। विभिन्न राज्यों के तमाम शहरों में ऐसे बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है जो परंपरागत और थके हुए एजुकेशन सिस्टम के बजाय कुछ अलग हटकर करना चाहते हैं। कुछ समय पहले तक बच्चों के माता-पिता इसकी अनुमति देने में भी घबराते थे मगर अब वो बच्चे की रुचि को समझकर उसे अपने हिसाब से निर्णय लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

बच्चों का सहज विकास

ज्योति शुक्ला

अहमदाबाद स्थित एक शिक्षण संस्थान की लेक्चरर और काफी समय से होम स्कूलिंग व स्किल डेपलपमेंट पर कार्य कर रहीं ज्योति शुक्ला बताती हैं, ‘होम स्कूलिंग के चलते बचपन में बिना किसी दबाव के बच्चों का सहज विकास होता है। वो सिस्टम की भेड़चाल में फंसने के बजाय रियल लाइफ लर्निंग की ओर प्रेरित होते हैं। होम स्कूलिंग से बच्चों को अनावश्यक तनाव और स्पर्धा का दबाव नहीं झेलना पड़ता है क्योंकि किसी और से स्पर्धा के बजाय बच्चे का पूरा ध्यान खुद को बेहतर बनाने की ओर ही होता है। सबसे बड़ी बात यह कि इस कदम से उन्हें व्यवसाय बन चुकी शिक्षा पद्धति का हिस्सा नहीं बनना पड़ता है। उन्हें अपनी स्किल डेवलपमेंट की ओर ध्यान देने का पर्याप्त समय मिल जाता है। समय का बेहतर सदुपयोग करने से उनकी क्रिएटिविटी बढ़ती है। कोर्स के इतर अलग-अलग किताबें पढ़ने के साथ-साथ उन्हें लाइफ से प्रैक्टिकल नॉलेज भी मिलता है। कई विदेशी संस्थानों में होम स्कूलर्स को उनकी काबिलियत के आधार पर रखने का प्रावधान है। इसमें अमेजन और गूगल जैसी कई बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं।’

रवि तिवारी के पिता राजेंद्र प्रसाद तिवारी बताते हैं कि रवि कक्षा आठ के बाद से ही वह ऐप से संबंधित विभिन्न सिक्योरटीज को गूगल करने लगा और एक वर्ष में ही वह आरएंडी कर करके इसमें पारंगत हो गया। हाई स्कूल करने के दौरान ही कानपुर के कई छोटे-मोटे व्यवसायी उसके क्लाइंट बन गये जिनकी मांग के अनुसार रवि उनके लिए मोबाइल ऐप बनाने लगा और साथ ही मोबाइल ऐप की सिक्योरिटी पर अपनी कंसलटेंसी देने लगा। कानपुर के कई निजी संस्थानों में अपनी सेवाएं देने वाले रवि को किताबी ज्ञान से ज्यादा गूगल यूनिवर्सिटी पर ज्यादा भरोसा है। अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने का रवि को कोई पछतावा भी नहीं है। रवि को ऐप की आरएंडडी और अपनी काबलियत पर पूरा भरोसा है।

आरएंडडी और अपनी काबलियत पर पूरा भरोसा

12 साल के बेटे अत्रि के बारे में अर्चना बताती हैं कि वो घर से ही फिल्म मेकिंग का ऑनलाइन कोर्स कर रहा है। एक तरफ उसे गीता के श्लोक याद हैं तो दूसरी ओर खुद ही रोबोट बनाने की कोशिशों में भी लगा है। इंटरनेट से वो खुद ही म्यूजिक भी सीख रहा है और समसामयिकी से लेकर राजनीति तक की तमाम जरूरी बातें भी समझ रहा है।

वैदेही के पिता संदेश व्यास कहते हैं कि स्कूल में उनकी बेटी की पढ़ाई के अलावा दूसरी प्रतिभा खत्म होती जा रही थीं। जिसके लिए अब उसे पर्याप्त समय मिल रहा है। हमने उसे पूरी तरह से दबाव मुक्त कर रखा है। अगर वो चाहेगी तो आगे प्राइवेट एग्जाम दिलाएंगे वरना इसके बिना भी वो मर्जी की जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र है।

मैत्रेयी ने आठवीं के बाद स्कूल में पढ़ाई नहीं की। दसवीं और बारहवीं की परीक्षा यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के स्कूल से दी है। खास बात ये कि मैत्रेयी ने सब विषयों की पढ़ाई बिना किसी कोचिंग या ट्यूशन के सिर्फ किताबों और ऑनलाइन एजुकेशन साइट्स से की है।

शिक्षा प्रणाली में सुधार की दरकार

मनोविश्लेषक डॉ. राकेश त्रिपाठी का कहना है, ‘ग्लोबलाइजेशन, सोशल मीडिया और इंटरनेट के दौर में आज पैरेंट्स के पास ऐसी जानकारियों का खजाना मौजूद है जिसके तहत वो बच्चे को स्कूल भेजे बिना भी उसका अच्छा फ्यूचर बनाने का विकल्प रख सकते हैं। इसलिए ऐसे संवेदनशील पैरेंट्स इस ओर मुड़ रहे हैं जो अपने बच्चों को दूर-दराज स्कूल, हैवी बैग, मोटी फीस, ट्यूशन और कोचिंग जैसी दिक्कतों से बचाना चाहते हैं। मगर तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि ऐसे बच्चे पारिवारिक, आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में होने के बावजूद सामाजिक सरोकारों से कहीं न कहीं कुछ हद तक कटे रह जाते हैं।’

क्या आरटीई एक्ट होमस्कूलिंग की राह में बड़ी बाधा है?

आज की शिक्षा व्यवस्था में होम स्कूलिंग के लिए कोई जगह नहीं

निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम (आरटीई एक्ट) 2009 स्कूल के अलावा किसी भी ऐसी जगह बच्चे के शिक्षा के अधिकार को मान्यता नहीं देता है जिसे अधिनियम के तहत मान्यता न मिली हो। अधिनियम के अनुसार, बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा किसी मान्यता प्राप्त स्कूल द्वारा दिया जाना अनिवार्य है। मतलब आज की शिक्षा व्यवस्था में होम स्कूलिंग के लिए कोई जगह नहीं है। गौरतलब है स्कूल के सम्बंध में अधिनियम की जो परिभाषा है, वह कुछ विशेष प्रकार के स्कूलों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गयी है।

आरटीई अधिनियम के ऐसे प्रतिबंधात्मक नियमों के मद्देनजर यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए चलाया जा रहा ओपेन बेसिक एजुकेशन (ओबीई) प्रभाव में रहना चाहिए अथवा नहीं। हालांकि प्राथमिक और सेकंडरी स्कूलिंग के लिए ओबीई शिक्षा और एनआईओएस एग्जामिनेशन को भारत सरकार से औपचारिक स्कूलिंग के समकक्ष मान्यता प्राप्त है। यहां से शिक्षा लेने वाले छात्र भी उच्च शिक्षा और रोजगार के समान अवसर के लिए योग्य माने जाते हैं। एनआईओएस सर्टिफिकेट उन बच्चों के लिए आगे की शिक्षा का वैकल्पिक रास्ता बनता है जो घर में रहकर पढ़ते हैं अथवा गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों से शिक्षा लेते हैं, या ग्रामीण इलाकों में वॉलंटियर्स अथवा पैरा टीचर्स से शिक्षा लेकर उच्च स्तर की औपचारिक शिक्षा हासिल करना चाहते हैं।

श्रेया सहाय बनाम केंद्र सरकार मामला

होम स्कूलिंग की स्थिति को और अधिक स्पष्ट करने के लिए 14 साल की श्रेया सहाय की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें यह कहा गया कि, चूंकि आरटीई एक्ट औपचारिक स्कूलिंग के अलावा किसी भी अन्य माध्यम से ली गई शिक्षा को मान्यता नहीं देता है, ऐसे में बच्चों के मौलिक अधिकारों का हनन है। इस याचिका में मांग की गई कि होमस्कूलिंग और वैकल्पिक शिक्षा वाले स्कूलों को भी स्कूल की परिभाषा के तहत लाया जाए और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओपेन स्कूलिंग (एनआईओएस) को 14 साल से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा देना जारी रखने के लिए अनुमति दी जाए।

इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने एक एफिडेविट दिया था जिसमें यह कहा गया कि होमस्कूलिंग गैरकानूनी नहीं है, और आरटीई अधिनियम किसी भी प्रकार से होमस्कूलिंग के आड़े नहीं आता है। लेकिन साथ में यह भी कहा गया था कि एनआईओएस का ओबीई कार्यक्रम मार्च 2015 के बाद 6-14 साल की आयुवर्ग वाले बच्चों को नहीं लेगा। अंततः हाई कोर्ट ने 2013 में इस याचिका को खारिज कर दिया था।

तबसे अब तक, ओबीई कार्यक्रम को समय-समय पर विस्तारित किया जाता रहा है, पहले मार्च 2017 तक, और हाल ही में मार्च 2020 तक “यह कहते हुए कि एनआईओएस आरटीई अधिनियम के सेक्शन 4 के तहत बच्चोँ को मुख्यधारा में लाने हेतु लगातार प्रगतिशील है।” मगर आरटीई अधिनियम के सेक्शन 4 के तहत मुख्यधारा में लाए जाने का क्या मतलब है, यह केंद्रीय एचआरडी मंत्रालय ने कहीं भी स्पष्ट नहीं किया है।

होमस्कूलिंग कब तक कानूनी है?

श्रेया सहाय के मामले में केंद्रीय एचआरडी मंत्रालय का एफिडेविट जो कि होमस्कूलिंग को कानूनी करार देता है, वह उन बच्चोँ के लिए बड़ी जीत है जो घर में रह कर पढ़ते हैं अथवा किसी अनौपचारिक माध्यम से शिक्षा ले रहे हैं। इस हिसाब से यह एफिडेविट बच्चों के शिक्षा के अधिकार और उनकी इच्छा को मान्यता देता है। लेकिन एक निम्न सरकारी मानसिकता का परिचय देते हुए सरकार ने मार्च 2020 के बाद एनआईओएस के भविष्य पर सवालिया निशान लगाकर बच्चों के अभिभावकों को अधर में लटका दिया है।

#होमस्कूलिंग  #आरटीईएक्ट

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