समग्र शिक्षा अभियान को लेकर मोदी सरकार कठघरे में। पश्चिम बंगाल सरकार का आरोप कि इस अभियान के तहत राशि के आवंटन में गैर-भाजपाई राज्य सरकारों के साथ केंद्र कर रहा है सौतेला व्यवहार।

 

रईस अहमद लाली

बहुत दिन नहीं बीते, जब केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लम्बे-चौड़े दावों के साथ ‘समग्र शिक्षा अभियान’ की शुरुआत की थी। कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबको शिक्षा, अच्छी शिक्षा’ को लेकर प्रतिबद्ध हैं और इसी के प्रेरणास्वरूप ‘समग्र शिक्षा अभियान’ की शुरुआत की जा रही है, ताकि स्कूली शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता को बढ़ाया जा सके। समग्र शिक्षा से समग्र विकास का लक्ष्य साधा जा सके। लेकिन चंद ही दिनों में केंद्र सरकार की यह पहल सवालों के घेरे में उतर आयी है। आरोप लग रहे हैं कि इस कदम के जरिये केंद्र समग्र विकास के लक्ष्य को नहीं, बल्कि भाजपा और भाजपा शासित प्रदेशों के सियासी विकास के लक्ष्य को साधने की साजिश कर रही है। यानी इस योजना के जरिये वह अपनी सियासत साध रही है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने खुला आरोप लगाया है कि इस अभियान के लिए धनराशि के आवंटन में पूरी तरह सियासी नफा-नुकसान देखा जा रहा है और उन्हीं राज्यों को ज्यादा राशि दी जा रही है, जहां भाजपा की सरकार है। दूसरे राज्यों की उपेक्षा की जा रही है।

पार्थ चटर्जीशिक्षा मंत्रीपश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने बाकायदा आंकड़ों का हवाला देते हुए इन आरापों को साबित करने की कोशिश की है। वह कहते हैं, ‘भाजपा शासित व बंगाल से कम आबादी वाले राज्यों को अधिक धनराशि देकर केंद्र ने बंगाल के प्रति अपना सौतेला रवैया साफ कर दिया है। बंगाल को मात्र 1221.94 करोड़ रुपये दिये गये, जबकि भाजपा शासित राज्यों बिहार को 2954.78 करोड़, मध्य प्रदेश  को 2335.49, राजस्थान को 2780.44, उत्तर प्रदेश को 4907.31 और पड़ोसी राज्य असम को 1535.31 करोड़ रुपये दिये गये हैं। इससे साबित होता है कि केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल के विकास के लिए कितनी ईमानदार है।’

दिलीप घोष, भाजपा अध्यक्ष, पश्चिम बंगाल

हालांकि आरोपों से घिरी भाजपा इससे साफ इनकार कर रही है। पार्थ चटर्जी के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पश्चिम बंगाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि ‘राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के मामले में पश्चिम बंगाल की जो स्थिति है, उसी के आधार पर राशि आवंटित की गयी है। इसमें पक्षपात और सौतेलेपन जैसी कोई बात नहीं है। सम्बन्धित विभाग की कमेटी राज्यों की स्थिति का पता लगाकर राशि आवंटित का प्रस्ताव देती है, जिस पर केंद्र सरकार मुहर लगाती है।’ घोष अपनी बातों को विस्तार देते हुए कहते हैं कि ‘समग्र शिक्षा अभियान के तहत केंद्र सरकार राज्यों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें राशि आवंटित करती है। किस राज्य में छात्र व शिक्षक का अनुपात कितना बेहतर है, स्कूल के प्रधानाध्यापक की अलग पहचान है या नहीं और नेशनल एचिवर सर्वे (नैस) में राज्य सरकार ने कितना बेहतर किया है, इसके आधार पर राज्यों को राशि आवंटित की जाती है।’

बंगीय शिक्षक व शिक्षाकर्मी समिति के कोलकाता मंडल के सह सचिव स्वप्न मंडल भी हालांकि दिलीप घोष की बात पर इत्तेफाक जताते हैं कि तयशुदा नियामकों के तहत ही पश्चिम बंगाल को धनराशि का आवंटन हुआ है। वह कहते हैं, ‘राष्ट्रीय स्तर पर अन्य राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है, इसलिए केंद्र सरकार ने बंगाल को अन्य राज्यों की तुलना में कम राशि आवंटित की है।’ लेकिन तृणमूल कांग्रेस इसे सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बता रही है। उसका कहना है कि जान-बूझकर बंगाल को कम राशि का आवंटन किया गया, क्योंकि यहां भाजपा की सरकार नहीं है और हम उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं।

स्कूली शिक्षा के विकास को लेकर एक ऊहापोह की स्थिति

बहरहाल, बंगाल को कम पैसे देने के पीछे क्या सोच रही है यह तो केंद्र सरकार ही भली-भांति जानती होगी लेकिन यह सच है कि इसे लेकर जारी राजनीतिक रस्साकशी ने सूबे की स्कूली शिक्षा के विकास को लेकर एक ऊहापोह की स्थिति कायम कर दी है।

गौरतलब है कि कई एसे मुद्दे हैं, जिन पर भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और सूबे की तृणमूल कांग्रेस की सरकार के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, लेकिन शिक्षा को लेकर खींचतान को लोग उचित नहीं मान रहे। कहने को भले ही सियासी तबके के लोग यह नारा बुलंद करने से पीछे नहीं रहते कि ‘पढ़ेगा इंडिया, तभी बढ़ेगा इंडिया’, लेकिन जब इसके लिए योजनाओं-कार्यक्रमों को जमीन पर उतारने की बात आती है तो यहां जम कर सियासत होने लगती है।

केंद्र सरकार की बहुप्रचारित और महत्वाकांक्षी ‘समग्र शिक्षा योजना’ के साथ भी यही हो रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार आरोप लगा रही है कि केंद्र सरकार राशि आवंटित करने में उसके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है, जबकि केंद्र सरकार का तर्क है कि प्रदर्शन के आधार पर राशि तय की गयी है। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच राज्य का ‘समग्र शिक्षा अभियान’ जरूर प्रभावित होता नजर आ रहा है। इसके बावजूद कि इसे लेकर कितने सुनहरे ख्वाब बुने गये हैं।

विदित है कि केंद्र सरकार पूरे देश में बड़े पैमाने पर स्कूली व्यवस्था को बदलने की कोशिश कर रही है। इसी के दृष्टिगत स्कूली व्यवस्था के विकास के लिए शैक्षणिक सत्र 2018-19 के लिए समग्र शिक्षा अभियान शुरू किया गया है। यानी देश में स्कूली शिक्षा के स्तर व गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं का एकीकरण किया गया है। कक्षा एक से आठ तक चलाये जाने वाले सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए), कक्षा नौ के बाद से चलाये जाने वाले राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) के साथ-साथ शिक्षकों के प्रशिक्षण समेत अन्य कार्यक्रमों को इस अभियान में शामिल किया है।

अब ‘समग्र शिक्षा अभियान’ के तहत ही इन तीनों कार्यों को किया जाएगा। समग्र शिक्षा अभियान सरकारी स्कूलों के 12वीं तक के विद्यार्थियों और स्कूलों की सभी गतिविधियों को नियंत्रित करेगा। बजट भी समग्र शिक्षा अभियान के तहत ही तैयार किया जाएगा। वर्ष 2018-19 में इस योजना के तहत लगभग 30 हजार करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं, जिसमें पश्चिम बंगाल के हिस्से में मात्र 1221 करोड़ रुपये ही आये हैं। यही आंकड़ा विवाद का विषय बना हुआ है।

विवाद बेवजह भी नहीं लगता। केंद्र सरकार ने समग्र अभियान के तहत हरियाणा जैसे छोटे और अपेक्षाकृत समृद्ध राज्य को 727.98करोड़ रुपये की ग्रांट जारी की है जबकि असम को 1535.31 करोड़ रुपये। ये दोनों ही सूबे भाजपा शासन के अंतर्गत हैं। बड़े राज्यों में भी उत्तर प्रदेश को 4907.31 रुपये, बिहार को 2954.78 करोड़ रुपये, राजस्थान को 2780.44 रुपये की धनराशि दी गयी है, जहां भाजपा की सरकारें हैं, जबकि बंगाल को महज 1221.94 करोड़ रुपये। जाहिर है कि जब राज्यों और उन्हें प्राप्त राशि की तुलना की जाएगी, तो संदेह उत्पन्न होंगे। मान भी लिया जाए कि प्रदर्शन के आधार पर धनराशि का आवंटन किया गया, तो भी क्या सिर्फ भाजपा शासित राज्य ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं? गैरभाजपा शासित राज्य कुछ नहीं कर रहे?

राज्य और आवंटित राशि

पश्चिम बंगाल- 1221.94 करोड़ रुपये

असम- 1535.31 करोड़ रुपये

मध्य प्रदेश- 2335.49 करोड़ रुपये

राजस्थान- 2780.44 रुपये

बिहार- 2954.78 करोड़ रुपये

उत्तर प्रदेश- 4907.31 रुपये

हरियाणा-  727.98 करोड़ रुपये

 

कम से कम केंद्र सरकार तो ऐसा ही मान रही है। और उसका यही मानना समग्र शिक्षा अभियान को सियासत के मैदान में उतार चुका है। इससे इसके उद्देश्यों के पूरा होने को लेकर संदेह भी गहरा गये हैं। वैसे भी इस अभियान का मकसद शिक्षा का स्तर सुधार कर तथा तकनीकी इस्तेमाल बढ़ाकर विद्यार्थी और शिक्षकों को अधिक सशक्त बनाना है। जब इस मकसद के पूरा होने को लेकर आशंकाएं उत्पन्न होंगी, तो नतीजे प्रभावित होंगे ही। बच्चों को समग्र रूप से विकास की ओर अग्रसर कैसे किया जा सकेगा? क्योंकि जरूरत तो आवश्यकतानुसार धन उपलब्ध कराने की है।

गौरतलब है कि इस अभियान में पांचवीं तक के स्कूल में खेल सामग्री के लिए हर साल 5,000 रुपये, दसवीं तक के स्कूल में 10,000 तथा 12वीं तक के स्कूलों में 15,000 रुपये दिये जाने का प्रावधान है। स्कूलों में लाइब्रेरी की किताबों के लिए हर वर्ष 5,000 से लेकर 20,000 तक की सहायता राशि मुहैया कराने की व्यवस्था बनायी गयी है। दूर-दराज और गांव में रहने वाली लड़कियों को शिक्षा देने के लिए कस्तूरबा गांधी विद्यालय योजना को बारहवीं तक बढ़ाया गया है और कौशल भारत में विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों को वोकेशनल ट्रेनिंग दिये जाने की बात की गयी है। अगर व्यवस्था पर सवाल उठेंगे, तो मकसद तो प्रभावित होगा ही।

#समग्रशिक्षाअभियान     #स्कूली शिक्षा    #मानवसंसाधनविकासमंत्रालय

 

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