यह विडंबना नहीं तो क्या है कि एक तरफ सरकार उच्च शिक्षा में सुधार के क्रांतिकारी कदम उठाने का दावा कर रही है, विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने की बात कर रही है जबकि उच्च शिक्षा में शिक्षकों का भारी टोटा बना हुआ है। देश के ज्यादातर उच्च शिक्षण संस्थान किराये के शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं।

 

रईस अहमद ‘लाली’

देश में शिक्षण संस्थानों और शिक्षा की हालत को लेकर अक्सर चिंताएं जतायी जाती रही हैं। शिक्षकों की कमी का हवाला भी दिया जाता रहा है। चाहे वह प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्र हो या फिर माध्यमिक शिक्षा का। लेकिन यह जानकर हर कोई हैरान होगा कि उच्च शिक्षा की हालत भी देश में अत्यंत निराशाजनक है। देश भर के उच्च शिक्षण संस्थान भी शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। स्थिति यह है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक में शिक्षकों के एक तिहाई से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान भी आवश्यकता से काफी कम शिक्षकों के सहारे चल रहे हैं। ऐसे में दूसरे विश्वविद्यालयों और संस्थानों की क्या हालत होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

उच्च शिक्षण संस्थानों की यह हालत तब है, जब देश में बड़े शिक्षा सुधार की दिशा में काम हो रहा है। भारतीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए केंद्र सरकार बड़े स्तर पर काम कर रही है। इसके तहत एक अलग से कोष बनाया गया है। साथ ही विश्व के तमाम देशों के साथ शैक्षणिक सुधार को लेकर अनुबंध भी किया गया है। लेकिन हालात जो तस्वीर पेश कर रहे हैं, उससे ये सारी कवायद कागजी साबित होती है।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह

स्वयं केंद्र सरकार भी यह मान रही है कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से पिछले दिनों राज्यसभा में यह जानकारी दी गयी कि देश के 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के एक तिहाई से ज्यादा पद खाली हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने बताया कि प्रोफेसरों के स्वीकृत 2417 पदों में से 1262 पद खाली हैं। और इन खाली पदों को भरने की दिशा में कितनी तेजी और कितनी गंभीरता से कदम उठाये जा रहे हें, इसका अनुमान इस बात से होता है कि 2016-17 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने 72 प्रोफेसरों की नियुक्ति की जबकि 2015-16 में 41 प्रोफेसरों की नियुक्ति की गयी थी।

आईआईटी कानपुर

बात सिर्फ प्रोफेसरों तक ही सीमित नहीं है, हर प्रकार के शिक्षकों को लेकर केंद्रीय विश्विद्यालयों की यही स्थिति है। उलटे और स्थिति गंभीर है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 17,106 पद में से 5,997 पद खाली हैं। सरकार दावा करती है कि उसने इन पदों को भरने के लिए कई कदम उठाये हैं, मगर उन कदमों का नतीजा किसी को नजर नहीं आ रहा। राज्यों के अधीन विश्वविद्यालयों, निजी विश्वविद्यालयों और डीम्ड विश्वविद्यालयों की स्थिति भी जस की तस है। आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थाओं तक में यह समस्या उच्च शिक्षा के विकास और शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन रही है।

गौरतलब है कि देश भर के उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की भारी कमी पर संसद में भी लगातार चिंता जतायी जाती रही है। संसद की एक समिति ने इस बात पर जोर दिया है कि पर्याप्त और योग्य शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, क्योंकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के लिए यह बेहद जरूरी है।

राज्यसभा में पेश मानव संसाधन विकास मंत्रालय से सम्बन्धित स्थायी समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति देश भर में उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की भारी कमी के सम्बन्ध में समय-समय पर अपनी चिंता व्यक्त करती रही है, लेकिन स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है और निकट भविष्य में भी इसमें सुधार नहीं दिखायी देता जबकि पर्याप्त और योग्य शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के लिए जरूरी है।

जाहिर है कि इन चिंताओं को सरकार व संबंधित पक्ष गंभीरता से नहीं ले रहे हैं वरना आज यह हालत नहीं होती। हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे, बल्कि और बिगड़ते जा रहे हैं। मौजूदा दौर में सरकारों का ध्यान सिर्फ खानापूर्ति में लगा है, जबकि राजनीतिक संगठन क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा केंद्रों से जुड़े हैं।

हालांकि सरकार यह दावा करना नहीं भूलती कि उसने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। मसलन उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की कमी को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों के रिटायरमेंट की उम्र को बढ़ाकर 65 वर्ष कर दिया गया है, वेतन संरचना में सुधार किया गया है, रिक्त पदों को भरा जा रहा है आदि। लेकिन समाधान क्यों नहीं निकल रहा, इसका जवाब उसके पास नहीं है। इसके बावजूद कि सारी तस्वीर उसके सामने साफ है। क्यों नहीं वह भर्ती की एक ऐसी व्यवस्था बना सकी है कि पद रिक्त होने से पहले ही भर्ती की प्रक्रिया प्रारंभ कर हो जाए ताकि भर्ती के बाद नवनियुक्त व्यक्ति तत्काल पद ग्रहण कर सके?

उच्च शिक्षा कैसे चल रही है, इसकी गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई विश्वविद्यालयों में तो महज 10-20 प्रतिशत शिक्षकों के सहारे ही काम चल रहा है। कई पाठ्यक्रम तो बिना शिक्षक के ही चल रहे हैं। कहीं नाम के शिक्षक हैं, तो कहीं जेआरएफ स्तर के लोगों से यह काम लिया जा रहा है। एडहॉक शिक्षकों के सहारे भी गाड़ी चलाई जा रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय तक में एडहॉक शिक्षकों से ही ज्यादा काम लिया जा रहा है। हालत यह है कि देश में सबसे ज्यादा एडहॉक शिक्षक दिल्ली विश्वविद्यालय में ही हैं।

बता दें कि डीयू में साढ़े चार हजार एडहॉक शिक्षक कार्यरत हैं। हर साल यह बयान दोहराया जाता है कि शिक्षकों के खाली पदों को एक साल के भीतर भर दिया जाएगा ताकि छात्रों की पढ़ाई में किसी प्रकार की दिक्कत न हो। जरूरत पड़गी तो एडहॉक शिक्षकों को ही नियमित होने कर दिया जाएगा। मगर न शिक्षक भरे जा रहे हैं और न एडहॉक शिक्षकों को नियमित किया जा रहा है। उलटे देश भर में एडहॉक शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग तैयार हो गया है, जिसकी अपनी अलग ही समस्या है। यह समस्या शिक्षा और सरकार के लिए भी एक बड़ी समस्या के तौर पर उभर चुकी है। वे 15-15 और कहीं-कहीं इससे भी ज्यादा वर्षों से इसी रूप में सेवा दे रहे हैं। उन्हें तय मानकों के हिसाब से वेतनमान और दूसरी सुविधाएं भी नहीं मिल रहीं। लिहाजा वे आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा की आगे और क्या हालत होगी, सहज समझा जा सकता है। और भारतीय विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय कैसे बन सकेंगे, इसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

पिछले दिनों यह खबर भी आयी थी कि दिल्ली, इलाहाबाद विश्वविद्यालय सहित देश के कई विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। सबसे चौंकाने वाली स्थिति ओडिशा के केंद्रीय विश्वविद्यालय की थी, जहां प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसर के कुल 154 पदों में से 137 पद खाली बताये गये थे। यानी पूरे विवि में पढ़ाने वाले 17 शिक्षक। जब केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ही प्रोफेसर के करीब 1334, एसोसिएट प्रोफेसर के 2250 और सहायक प्रोफेसर के 2557 पद खाली हों तो दूसरों का हाल क्या होगा?

देश के जिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के आधे से ज्यादा पद खाली बताये गये थे, उनमें दिल्ली विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ का गुरु घासीदास विवि, मध्य प्रदेश की इंदिरा गांधी राष्ट्रीय ट्राइबल विवि, इलाहाबाद विवि (करीब 65 फीसदी पद खाली हैं), बिहार का महात्मा गांधी केंद्रीय विवि, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और झारखंड, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु के केंद्रीय विवि प्रमुख रूप से शामिल हैं। जवाहर लाल नेहरू विवि (करीब 31 फीसदी पद खाली), जामिया मिलिया विवि (करीब 19 फीसदी पद खाली), बीएचयू (करीब 30 फीसदी पद खाली), विश्व भारती (करीब 20 फीसदी पद खाली), भीमराव अंबेडकर विवि (करीब 35 फीसदी पद खाली) जैसे अन्य प्रमुख केंद्रीय विवि भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं।

अक्सर कहा जाता है कि उच्च शिक्षा को लेकर ज्यादातर विश्वविद्यालय मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। जब शिक्षकों की ही इतनी कमी हो, तो दूसरे मानक पर वे कैसे खरा उतरें? गौरतलब है कि आज की तारीख में देश भर में केंद्रीय विश्वविद्यालयों की संख्या 47, निजी विश्वविद्यालय 296, राज्यों के अधीन विश्वविद्यालय 384 और डीम्ड विश्वविद्यालय की संख्या 123 तक जा पहुंची है जो आजादी के समय महज 27 थी। उच्च शिक्षा के छात्रों की तादाद भी काफी बढ़ी है। साठ के दशक में उच्च शिक्षा में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या मात्र एक लाख उन्नीस हजार थी, जो 1970 में बढ़कर सात लाख साठ हजार हो गयी। अब यह संख्या पैंतीस करोड़ के पार है। इसमें लड़कियों की भागीदारी 47 प्रतिशत के आसपास है।

कॉलेज में छात्रों को पढ़ाते शिक्षक

लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या तो बढ़ी है, मगर उस अनुपात में शिक्षा सुविधाओं की वृद्धि नहीं हुई है। इसके बावजूद कि इन शिक्षा सुविधाओं के लिए आजादी के बाद उच्च शिक्षा के हालात का जायजा लेने के लिए अगस्त 1949 में बने राधाकृष्णन आयोग को विश्वास था कि विश्वविद्यालय राष्ट्र की आकांक्षा और आशा के अनुरूप खुद को ढाल लेंगे।

अफसोस, सारी उम्मीदें धरी की धरी हैं। देश में युवा उच्च शिक्षा के लिए आतुर है। विविधतापूर्ण विषयों के साथ उच्च शिक्षा में विकल्प भी बढ़े हैं, मगर सुविधाएं नदारद। शिक्षक गायब। यही वजह है कि उच्च शिक्षा के लिए छात्रों का पलायन जारी है। जबकि सरकार विदेशी छात्रों को भारत बुलाने के उपक्रम में फंसी है।

देश की राजधानी में स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय में ही करीब 50 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं। उनकी बहाली नहीं हो रही। विकल्पों से ही काम चलाया जा रहा है। एडहॉक शिक्षकों से आखिर कितना लक्ष्य साधा जा सकेगा? उन्हें भी अपने दूसरे स्थायी सहकर्मियों के मुकाबले कम वेतन और सुविधाएं मिल रही हैं। इलाहाबाद विवि में तो ज्यादातर क्लास जेआरएफ ले रहे हैं। 30,000 रुपये मासिक की पारिश्रमिक पर। कहीं कहीं तो प्रति लेक्चर के हिसाब से भुगतान हो रहा है, जो महीने का 20 हजार भी नहीं हो पाता। कुछ पाठ्यक्रम तो ऐसे हैं, जहां शिक्षक ही नहीं है। कहीं हैं तो अनुपातिक तौर पर बेहद कम। मसलन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में 1500 छात्रों के लिए महज 4 शिक्षक हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि एडहॉक शिक्षकों की नियुक्ति में भी रुकावट पैदा हो रही है।

यूजीसी नियमावली के अनुसार किसी भी विश्वविद्यालय में एडहॉक शिक्षकों की संख्या कुल स्वीकृत शिक्षकों के पद के 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती, मगर ज्यादातर विश्वविद्यालयों में यह 50 का आंकड़ा पार कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट के नये निर्देशों के बाद उनकी सेवाएं भी खतरे में हैं और नयी नियुक्तियां हो नहीं रहीं। यानी हमारे विश्वविद्यालय ऐसी स्थिति में उतरते नजर आ रहे हैं, जहां शिक्षकों का टोटा और गंभीर स्थिति अख्तियार करने वाला है। ऐसे में उच्च शिक्षा भगवान भरोसे ही है। यानी राम भरोसे विश्वविद्यालय।

 

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