इतिहास में शत प्रतिशत, मनोविज्ञान में शत प्रतिशत…। भाषा और साहित्य के पेपर्स में 99 प्रतिशत अंक। टॉपर के ठीक बाद के कई बच्चों को भी लगभग इतने ही अंक मिलें हैं। न जाने ऐसे ही कितने छात्रों को हिंदी, अंग्रेजी में शत प्रतिशत अंक आए हों। संपूर्णता का भ्रम उत्पन्न करते ऐसे परीक्षा परिणाम इस तथ्य को नेपथ्य में डाल देते हैं कि हमारे बच्चों की तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता के विकास पर उचित ध्यान नहीं दिया जा रहा। 

विकास पाण्डेय

12वीं की परीक्षा में टाॅपर

10वीं की परीक्षा में टाॅपर

पिछले दिनों सीबीएससी ने दसवीं और बारहवीं परीक्षा के नतीजे घोषित किये।12वीं की परीक्षा में इस बार 83.01 प्रतिशत छात्र-छात्राओं ने सफलता प्राप्त की। वहीं इस साल 10वीं की परीक्षा में 86.7 फीसदी बच्चे पास हुए हैं।12वीं की परीक्षा में टाॅपर को 500 में 499 अंक मिले। इतनी उच्च स्तरीय काबलियत पर हर किसी को गर्व होना स्वाभाविक है।

लेकिन सीबीएसई के रिजल्ट ने बहुत सारे ऐसे लोगों को इस बिंदु पर सोचने को विवश कर दिया है, जो शिक्षा शास्त्री नहीं हैं कि 500 में 499 अंक मिलने का अधार क्या है? उनको लगता है, नहीं, यह ठीक नहीं है। आखिर, यह बारहवीं की परीक्षा है। वस्तुनिष्ठता के साथ तार्किकता और विश्लेषणात्मकता का समावेश होना ही चाहिए। लेकिन, मौजूदा स्कूली शिक्षा इसे हतोत्साहित करती है। सूचना ही अभीष्ट नहीं है, इसका विश्लेषण भी आवश्यक है। हद से ज्यादा वस्तुनिष्ठता ज्ञान को सूचना मात्र में बदल देती है, जबकि सूचनाओं पर तार्किक विचार की जरूरत भी होती है।

गौरतलब है कि दिल्ली के प्रिंस कुमार ने 12वीं में विज्ञान वर्ग में टॉप किया है। प्रिंस के पिता दिल्ली में डीटीसी बस चलाते हैं। ऐसे में प्रिंस के पास दूसरे बच्चों जितनी सुविधाएं नहीं थीं। बावजूद इसके उसने अपनी मेहनत और लगन से परीक्षा में टॉप किया। किंतु सीबीएससी के इन नतीजों में कला वर्ग के छात्र विज्ञान वर्ग पर हावी ही दिखे।

लेक्चरर चेताली श्रीवास्तव

टीएस पब्लिक स्कूल में हिंदी की लेक्चरर चेताली श्रीवास्तव बताती है, ‘एक दशक पहले तक परीक्षा के परिणामों में कुछ और रंग देखने को मिलता था। देश के लगभग सभी बोर्डों में विज्ञान व कला वर्ग के परीक्षा परिणामों में काफी बड़ा अंतर देखा जाता था। टाॅपर भी विज्ञान वर्ग से ही निकलते थे। कला वर्ग का सफलता प्रतिशत तो ज्यादा होता था लेकिन टाॅपर यदाकदा ही होते थे। आज समय बदल गया है, शिक्षण विधि में क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुके हैं। लेकिन तार्किकता और विश्लेषणात्मकता को दरकिनार करते हुए केवल तथ्यों के आधार पर मूल्यांकन करने के खेल में सीबीएससी काफी आगे निकल गया है। इसकी वजह से राज्यों के शिक्षा बोर्डों के सामने छात्रों के भविष्य को लेकर एक असमंजस्य की स्थिति पैदा होती जा रही है। सौ फीसदी अंक देखकर उस विद्यार्थी के मानसिक स्तर को परखना आसान नहीं होता है, ऐसे में कभी-कभी वास्तविक स्थिति का वस्तुज्ञान नहीं हो पाता है।’

संपूर्णता का भ्रम रचते सीबीएससी के परीक्षा परिणाम

दरअसल सीबीएसई सहित कुछ संस्थान विगत कुछ वर्षों से जिस तरह से परीक्षा-परिणामों को तैयार कराते समय अति उदारवादिता का परिचय देते आ रहे हैं, उन पर अब शासन-स्तर पर संज्ञान लेने की आवश्यकता आ पड़ी। इसकी वजह भी हैं। कथित संस्थानों ने कुछ वर्षों से जिस तरह के परीक्षा-परिणाम जारी किये हैं, उसने अभिभावकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

अब आप जरा गौर कीजिए, विज्ञान में 100 में 100 अंक और अर्थशास्त्र में 100 अंक, भूगोल, इतिहास, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विषयों में 100 में 100 अंक दिये जा रहे हैं। हद तो तब हो जा रही है जब हिंदी और अंग्रेजी जैसे साहित्य के विषयों में भी 100 में 100 अंक दिये जा रहे हैं। अब प्रश्न उठता है– इतने अधिक अंक विद्यार्थियों को किस वैधानिक और औचित्यपूर्ण नियमों के अन्तर्गत प्राप्त हो रहे हैं, फिर दूषित और भविष्यघाती मूल्यांकन-पद्धति के प्रभावी होने से ऐसे विद्यार्थी आईएएस, इंजीनियर, डॉक्टर आदि बनाने का सपना देखने लगते हैं। परन्तु कितने अर्श पर होते हैं कितने फर्श पर, इसे हम देखते आ रहे हैं। सीबीएससी सहित अन्य संस्थानों के मानदंड पर खरे उतरे ऐसे छात्र‘नीट’,‘जेई’जैसी प्रवेश-परीक्षाओं में भी सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। वहीं एक मेधावी विद्यार्थी मात्र80 से 85 प्रतिशत अंक पाकर रह जाता है! आखिर इतनी बड़ी विसंगति क्यों?

अन्ततः, इन्हीं तथाकथित टॉपरों को 95 से 99 प्रतिशत तक अंक दिये जाते हैं। ऐसे कथित टॉपरों में से अधिकतर विद्यार्थियों में तार्किकता और विश्लेषणात्मकता का अभाव देखने को मिलता है। ऐसी परीक्षा-पद्धति अब कोढ़ में खाज का काम कर रही है। दरअसल, व्यवस्था की इस प्रवृत्ति को व्यापक संदर्भों में देखने-समझने की जरूरत है। सूचनाओं के विश्लेषण की क्षमता का विकास, उन पर तर्क कर सकने की क्षमता का विकास अंततः व्यवस्था को ही चुनौती देगा। किशोर होते बच्चे और युवा होते किशोर अगर तर्क करने लगें, विश्लेषण करने लगें तो सूचनाओं में अंतर्निहित वे तथ्य भी उधड़ सकते हैं जो व्यवस्था नहीं चाहती। तर्क करता युवा, विश्लेषण करता युवा व्यवस्था, यानी कि सिस्टम के लिये खतरा हो सकता है। हद से ज्यादा वस्तुनिष्ठता इन खतरों को कम करती है।

एजूकेशन व कैरियर काउंसलर यश सिंह

वहीं एजूकेशन व कैरियर काउंसलर यश सिंह छात्रों में केवल अंकों को वरियता देने और विश्लेषण करने की क्षमता में हो रही लगातार गिरावट की वजह रट्टामार शिक्षण प्रणाली को मानते हैं। वह कहते हैं, ‘वर्तमान में जो शिक्षा और परीक्षा प्रणाली है वह ‘क्रैश कोर्स’ टाइप के हास्यास्पद स्लोगन देने वाले कोचिंग संस्थानों को फलने-फूलने के असीम अवसर देती है, बच्चों को रट्टामार बनने के लिये प्रोत्साहित करती है जबकि…कल्पनाशक्ति सम्पन्न बच्चों को हतोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। हमारी शिक्षा-परीक्षा प्रणाली व्यवस्था के लिये भले ही अभीष्ट और मुफीद हो, देश, समाज और सभ्यता के लिये ठीक नहीं, भावी पीढ़ियों के व्यक्तित्व निर्माण के व्यापक संदर्भों में ठीक नहीं। यह सर्वश्रष्ठ प्रतिभाओं को सामने नहीं आने देती।’

सवाल तो होने ही चाहिए

ऐसे परिणाम बच्चों में असंतोष, कुंठा ,हताश मनोवृत्ति और आत्मघाती प्रवृत्तियों को जन्म देते हैं।जिन छात्रों को इतने अंक मिले उन्हें यकीन नहीं हो रहा जो वहां तक नहीं पहुंचे वे हताश हो रहे।ऐसी अंधी दौड़ कब तक चलेगी।ऐसा न तो हो सकता है और न होना चाहिए।मशीन की तरह परीक्षार्थी एकदम त्रुटिहीन नहीं हो सकते।कामा फुलस्टाप विराम चिन्ह वर्तनी ,अनुस्वार जैसी हजारों त्रुटियां होती हैं उत्तर लिखने में। यह मेरा भी अनुभव रहा छात्र जीवन का।फिर 100 में 100 क्यों भला?बच्चों पर इतना दबाव मत डालिये कि वह फिर उठ ही न पायें। जीवन को जीवन रहने दीजिए।अंक जरूरी हैं पर इस तरह की अति अराजक अनावश्यक और तनाव कारक है।

प्रख्यात शिक्षाविद्, भाषाविद् और समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रख्यात शिक्षाविद्, भाषाविद् और समीक्षक डाॅ पृथ्वीनाथ पाण्डेय इन परीक्षा नतीजों को लेकर खासे चिंतित नजर आते हैं, वह कहते हैं, ‘वास्तव में, यह मूल्यांकन-पद्धति देश के लिए ऐसे संकट का कारण बनेगी, जिसकी ओर किसी की दृष्टि नहीं जाती। जहां पहली ओर, गर्व से पीठ थपथपायी जा रही है, वहीं दूसरी ओर, एक ‘मौन’ है, जो भविष्य में ‘मुखर प्रश्न’ करने के लिए बाट जोह रहा है और वह यह है कि जितनी बड़ी संख्या में विद्यार्थी उत्तीर्ण हो रहे हैं, आगे चलकर उनके लिए नियोजन की व्यवस्था कौन करेगा और कैसे? देश के लाखों शिक्षित अनियोजित युवा शिक्षा-परीक्षा और मूल्यांकन-पद्धति की विकृतियों का दंश झेल रहे हैं।

मूल्यांकन की प्रक्रिया पर संदेह

मूल्यांकन की प्रक्रिया एक ऐसा आईना है जिसमें उस शिक्षण प्रणाली के पीछे रही सोच की गंभीरता या छिछलेपन का अक्स देखा जा सकता है। करीब दो दशक पहले भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की मौजूदा मूल्यांकन प्रणाली को डेविड ऑसबरॉ ने ‘घनचक्कर की पहेली’ नाम से संबोधित किया था जो आज तक अनसुलझी ही है। हाल के घोषित परिणामों मेंमिनियम लर्निंग लेवल की पदचाप साफ सुनाई दे रही है और यह इसी खतरे की तरफ इशारा करता दिखाई दे रहा है। इसलिए छात्रों की भलाई के लिए मूल्यांकन की संपूर्ण प्रक्रिया को ठीक उसी तरह बाहर फेंक देना चाहिए जैसे 19वीं शताब्दी के लंदन में शयनागारों की खिड़कियों से चेम्बरपोस्ट्स खाली किए जाते थे। वरना बेरोजगारों की कतार बढ़ती ही जायेगी।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली और मूल्यांकन पर डाॅ पृथ्वीनाथ कहते हैं,‘देश और राज्य के शिक्षा मंत्रालय को संचालित करने वालों की आंखें दूरगामी दुष्परिणाम की ओर से मूंदी हुई हैं। वहीं मूल्यांकन-पद्धति का परिणाम वस्तुतः अयोग्यतर और योग्यतर में अन्तर नहीं कर पाता। जो परीक्षाओं में अपेक्षाकृत अत्युत्तम प्रदर्शन कर चुके हैं, उनका समुचित मूल्यांकन न हो पाना, उन्हें अवसाद की ओर ले जाता है, हताशा में आत्महत्या के प्रकरण भी देखे गये हैं। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् और सीबीएसई की मूल्यांकन-पद्धतियों से एक विशद् और बृहद् अन्तराल का बोध होता है।’

इन परीक्षा प्रणालियों के नकारात्मक पक्ष के सवाल पर उन्होंने कहा कि, ‘इसका सर्वाधिक नकारात्मक पक्ष यह है कि अध्ययन-अध्यापन और शिक्षा-परीक्षा का स्तर पूर्णतः पतन की उन्मुख है। हमारे शिक्षाशास्त्री पूर्णत‘ अपराधियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जिन्होंने अपनी ‘क्लीव’ मनोवृत्ति का परिचय देते हुए, उथली शिक्षा-पद्धति को मौन स्वीकृति करते आ रहे हैं। जबकि अधिकतर विद्यार्थी शासकीय सेवाओं में स्वयं को नियोजित करना चाहते हैं, परन्तु जिन अनियोजितों की संख्या करोड़ों में पहुंच रही है, उनका मार्ग कैसे प्रशस्त होगा? अब यह यक्ष प्रश्न बन चुका है।’

ऐसी अंधी दौड़ कब तक चलेगी

अस्सी के दशक के अंत में अपने एक आलेख में न्यूतम अधिगम स्तर की व्याख्या करते हुए ​लेख डेविड ऑसबरॉ ने लिखा था कि, “परीक्षा केवल छात्र की स्मरण शक्ति की जांच करती है, न कि उसकी शैक्षणिक उपलब्धियों और सृजनात्मकता की। यह प्रक्रिया साल दर साल दोहराई जाती है और अंत में बहुत ही कम तथ्य दिमाग में रह पाते हैं। इसकी सत्यता की जांच बीए प्रथम वर्ष के किसी छात्र से कुछ प्रश्न पूछकर की जा सकती है।”

डेविड के अनुसार, “रटने की योग्यता किसी भी काम को समझदारी से कर सकने की योजनाओं में से एक नहीं है। मूल्यांकन को वस्तुनिष्ठ बनाने के लिए बहुत से क्रिया कलापों को साधारण पाठ्यक्रम से निकाल दिया जाता है। जैसे कला, हस्तशिल्प, संगीत, विचार-विमर्श, कविता (पाठ्यपुस्तकों में आई कविताओं को छोड़कर)। ये विधाएं किसी प्रकार पाठ्यक्रम में रह भी जाएं तो उन्हें महत्व नहीं मिलता। अधिक से अधिक इन्हें हॉबी मान लिया जाता है। यदि शिक्षा का उद्देश्य सम्पूर्ण व सुखी मानवों का निर्माण करना है, जो विद्यालय छोड़ने के बाद समाज को कुछ दे सकें तो ये विधाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं।”

वह अपने लेख में आगे लिखते हैं, ‘इसी प्रकार मूल्यांकन ने पाठ्यपुस्तकों को बर्बाद कर दिया है। आज पाठ्यपुस्तक कुछ तथ्यों का संकलन मात्र बनकर रह गई हैं, जिसका रट्टा मारना परीक्षा के लिए जरूरी है। आज की शिक्षा व्यवस्था में खुले प्रश्नों की अनुमति नहीं है ताकि हर छात्र अलग-अलग जवाब दे सके। क्योंकि इससे अंक प्रदान करना शिक्षक के लिए आसान नहीं होगा। पढ़ाई के दौरान ही शिक्षक और छात्र यह सोचते हैं कि क्या परीक्षा में यह सवाल आएगा? बाकी रही सही कसर ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने की होड़ से पूरी हो जाती है।’

परीक्षा मूल्यांकन की पद्धति का उद्देश्य

मूल्यांकन की किसी भी प्रणाली का उद्देश्य आकलन के द्वारा छात्रों को फीडबैक प्रदान करना तथा उनके सीख स्तर में सुधार करना होता है। पिछले दशक में जो प्रणाली उपयोग की जा रही थी उसमें फीडबैक प्रदान करना तथा आवश्यकतानुसार सुधारात्मक कार्रवाई प्रणाली का अभाव था और इस प्रणाली अपनी एक सीमा भी थी, इसी को देखते हुए सतत और व्यापक मूल्यांकन प्रणाली का प्रयोग किया गया है। यह सोचा गया था कि आकलन की यह प्रणाली विद्यालय में बच्चे के प्रदर्शन को मापने के बेहतर तरीके प्रस्तुत करती है।

शिक्षा का उद्देश्य सम्पूर्ण व सुखी मानवों का निर्माण करना

जब आरटीई अधिनियम का मसौदा तैयार किया गया तो मूल्यांकन का मामला इसके केंद्र में था। अधिनियम ने इसे सतत और व्यापक मूल्यांकन या सीसीई के रूप में स्थान दिया। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए संघर्ष से पहले ही इस प्रकार के विरोध स्वर उठे थे कि हम कैसे एक ऐसी मूल्यांकन प्रणाली के साथ जा सकते हैं जो न्यायपूर्ण हो तथा जो सिर्फ अंकों के आधार पर लिए गए निर्णय पर भरोसा न करती हो। हालांकि यूनिसेफ ने 2014 में सीसीई प्रणाली की जमीनी हकीकत को समझने के लिए छह राज्यों-बिहार, गुजरात, महाराष्टड्ढ्र, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में एक अध्ययन शुरू किया था। यूनिसेफ द्वारा यह अध्ययन सीसीई की वर्तमान वास्तविकता को समझने का पहला व्यापक प्रयास था।

सीसीई के तहत छात्रों की प्रगति के सह-शैक्षिक आयामों के आकलन को भी स्थान दिया गया है। यह उत्साहजनक प्रगति है, हालांकि यह अभी तो एक शुरुआत मात्र है। जबकि यूनिसेफ का अध्ययन पाता है कि सीसीई को सही तरीके से लागू करने के लिए आवश्यक माहौल और सुविधाओं का अभाव है। परंपरागत शिक्षक संचालित शिक्षण प्रक्रिया सीसीई के लिए अनुकूल नहीं है। इसके अलावा मूल्यांकन में यथार्थ स्थिति भी कम परिलक्षित होती है। जबकि होना तो यह चाहिए कि विद्यालयों में बेहतर मूल्यांकन प्रक्रिया, फीडबैक और सुधारात्मक प्रक्रिया का प्रदर्शन शिक्षकों के समक्ष करना चाहिए। पूरी शिक्षा व्यवस्था में यह समझ विकसित हो कि उनकी जवाबदेही बच्चों की प्रगति के लिए है।

#सीबीएससी   #मूल्यांकन   #आरटीई

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