ऐसा नहीं है कि सिर्फ इंजीनियरिंग और एमबीए की ही पढ़ाई के प्रति छात्रों में उदासीनता आयी हैमेडिकल के पाठ्यक्रमों से भी उनका मोहभंग हुआ है। इसका प्रमाण है सैकड़ों की संख्या में मेडिकल कॉलेजों में पीजी की खाली सीटें।

 

रईस अहमद लाली

            पिछले दिनों खबर आयी थी कि एआईसीटीई (ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन) देश भर में इंजीनियरिंग की लगभग 1.30 लाख सीटें घटाने की तैयारी कर रहा है। इस कदम के पीछे तकनीकी संस्थानों-कॉलेजों द्वारा उसे प्राप्त आवेदन थाजिसमें उन्होंने अपने यहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी तरह बंद करने या कुछ पाठ्यक्रमों को खत्म करने की इच्छा जताई थी। जिन 83 शैक्षिक संस्थानों और 450 कॉलेजों ने इसके लिए आवेदन किया थाउनके यहां इंजीनियरिंग की लगभग 25000 सीटें थीं।

जाहिर है कि ऐसा इसलिए हो रहा हैक्योंकि अब छात्रों का इंजीनियरिंग से मोहभंग होता जा रहा है। उन्हें इसकी पढ़ाई अपने करिअर के लिहाज से बहुत फायदेमंद नहीं लग रही। अव्वल तो नौकरी के भी लाले पड़ रहे हैं और किसी तरह नौकरी मिल भी जा रही हैतो पैसे बहुत कम मिल रहे। गाहे-बगाहे ऐसी खबरें भी आती हैं इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्री लेकर छात्र चपरासीक्लर्क और सिपाही बनने के लिए अर्जियां दे रहे हैं। यही वजह है कि इतनी महंगी पढ़ाई पढ़ के भी असुरक्षित नहीं होना चाह रहे छात्र। कुछ ऐसा ही हाल एमबीए को लेकर भी हैजहां अप्रत्याशित तौर पर छात्रों की कमी देखी जा रही है। अधिकांश संस्थानों में इंजीनियरिंग की तरह एमबीए की सीटें भी खाली रह जा रही हैं। लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि अब मेडिकल शिक्षा को लेकर भी छात्रों की रुचि कम हो रही है जबकि एक दौर में इसे बेहतर करिअर की गांरटी माना जाता था।

पीजीआई, लखनऊ: मेडिकल चिकित्सा शिक्षा को लेकर भी छात्रों की रुचि कम हो रही है

खबर बेचैन भी करती है और हैरत में भी डालती है कि मेडिकल चिकित्सा क्षेत्र में भी सीटें खाली रह जा रही हैं। कॉलेज और संस्थान छात्रों की राह देख रहे हैं और छात्र नदारद हैं। जी हांचिकित्सकों को उपचार की विशेषज्ञता हासिल कराने वाले स्नातकोत्तर पाठयक्रमों यानी पीजी कोर्स में सैकड़ों की संख्या में सीटें खाली हैं।

सामान्य डिग्रीधारियों के लिए नौकरियों में कमी की बात तो अब आम हैइंजीनियरिंग आदि कुछ डिग्रियों की महत्ता कम होने की बात भी अब नयी नहीं रह गयी है। मगर कोई एमबीबीएस चिकित्सक बेरोजगार रहेऐसा शायद ही कभी सुनने-देखने में आया है। फिर क्या वजह है कि इसके पीजी पाठ्यक्रमों में सीटें खाली रह जा रही हैंक्यों मेडिकल शिक्षा में विशेषज्ञता हासिल करने से दूर होते जा रहे हैं छात्रक्या छात्र स्वयं गंभीर पाठ्यक्रमों से दूर भाग रहे हैंया फिर चिकित्सकों के सम्मान में जो कमी आयी है और अस्पतालों में उन पर इलाज में लापरवाही को लेकर लगातार हमले हो रहे हैंउस भय की वजह से छात्र पीछे हट रहे हैंअथवा भारतीय चिकित्सा परिषद् के विधान में संशोधन कर वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े चिकित्सकों को एक सेतु-पाठ्यक्रम के जरिए एलोपैथी चिकित्सा करने की जो छूट दिये जाने की कवायद चल रही हैउसकी वजह से सीटें रिक्त रह जा रही हैं?

आंकड़े बताते हैं कि इस साल मेडिकल चिकित्सा के पीजी पाठ्यक्रमों में शल्य चिकित्सक हृदय (कॉर्डियक) में 104, हृदयरोग विशेषज्ञ55, बालरोग विशेषज्ञ 87, प्लास्टिक सर्जरी 58, स्नायु-तंत्र विशेषज्ञ (न्यूरोलॉजिस्ट) 48 और स्नायु-तंत्र शल्यक्रिया विशेषज्ञों की भी 48 सीटें खाली रह गयीं। छात्रों की इस कमी के मुख्यत: दो कारण गिनाये जा रहे हैं। पहला कि इन पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा के लिए योग्य अभ्यर्थी पर्याप्त संख्या में नहीं मिले। दूसरेपीजी के लिए जो योग्य विद्यार्थी मिले भीउन्होंने इन पाठ्यक्रमों में पढ़ने से मना कर दिया।

डॉ. अंजनी चौहानविशेषज्ञ चिकित्सक

विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. अंजनी चौहान कहते हैं कि मौजूदा दौर में छात्र उन पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने से कतराने लगे हैंजिनमें विशेषज्ञता हासिल करने में लम्बी अवधि लगती हो। इसके बजाय वे ऐसे पाठ्यक्रमों में विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैंजहां जल्दी यह हासिल हो जाए और वे अच्छा कमाना शुरू कर दें।‘ 

गौरतलब है कि गुर्दानाककानदांतगला रोग एवं विभिन्न तकनीकी जांच विशेषज्ञ 35साल की उम्र पर पहुंचने के बाद शल्यक्रिया शुरू कर देते हैंजबकि हृदय और तांत्रिका-तंत्र विशेषज्ञों को इसका मौका 40-45 साल की उम्र बीत जाने के बाद मिलता है। साफ है कि दिल और दिमाग का मामला बेहद नाजुक हैइसलिए इनमें लम्बा अनुभव भी जरूरी है। लेकिन जिस तरह विशेषज्ञता हासिल करने को लेकर मेडिकल के छात्रों की रुचि कम हो रही हैउससे भविष्य में इन रोगों के उपचार से जुड़े चिकित्सकों की कमी आने का खतरा बढ़ गया है।

यहां उल्लेखनीय यह भी है कि जिस तरह वर्तमान केंद्र सरकार ने भारतीय चिकित्सा परिषद् को खारिज कर राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद् (एनएमसी) बनाने का फैसला लिया हैउसे भी एलोपैथी चिकित्सा को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा है। चिकित्सकों द्वारा इसका जमकर विरोध भी हो रहा है।

गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार ने 2016 में एनएमसी को धरातल पर उतारने का निर्णय लिया था। शुरुआत में तो इसका मकसद चिकित्सा शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारनाइस पेशे को भ्रष्टाचारमुक्त बनाना और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ना बताया गया था। लेकिन जब एनएमसी विधेयक का प्रारूप तैयार हुआ और विशेषज्ञों ने इसका मूल्याकंन कियातो इसे आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा के लिए विनाशकारी पाया गया। इसके बाद से ही एमबीबीएस चिकित्सक इसके विरोध में खड़े हो गये। देश भर में इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन देखे गये हैं।

यह विधेयक आयुर्वेदहोम्योपैथी और यूनानी चिकित्सकों को भी ब्रिज कोर्स करके वैधानिक रूप से एलोपैथी चिकित्सा करने का हकदार बनाता है। वैसे अभी भी ऐसे ज्यादातर चिकित्सक बेरोकटोक एलोपैथी की दवाएं लिखते हैंकिंतु यह व्यवस्था अभी गैर-कानूनी है। एनएमसी विधेयक इसे कानूनी जामा पहना देगा। जाहिर है इसने भी कहीं न कहीं एमबीबीएस चिकित्सकों में असुरक्षा की एक भावना को जन्म दिया हैजिसका असर इस पद्धति की उच्च शिक्षा पर पड़ता देखा जा रहा है।

एमबीबीएस चिकित्सक डॉ. निखिल बंसल कहते हैं, ‘जब सभी तरह के चिकित्सकों को एलोपैथी दवाएं लिखने की कानूनी छूट मिल जाएगीतो भला कौन पैसा और समय बर्बाद कर एमबीबीएस करना चाहेगा। आज देश में जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां हैंउनमें सबसे असरदार एलोपैथी ही है। इसीलिए इसकी शिक्षा भी महंगी है। पहले भी महंगी शिक्षा के कारण छात्र इससे दूर रहने को मजबूर होते रहे हैं। अब अगर नयी व्यवस्था कायम हो जाएगीतो कोई क्यों एमबीबीएस के बाद पीजी करना चाहेगा। लोग तो एमबीबीएस से भी कटने लगेंगे। सिद्धांतत: भी यह सही नहीं है कि किसी साधारण आॅटो-टैक्सी लायसेंसधारी चालक को आप कुछ समय प्रशिक्षण देकर हवाई जहाज चलाने की अनुमति दे दें।‘ 

यह बात सच है कि चिकित्सा की हरेक पद्धति एक वैज्ञानिक पद्धति है और सैकड़ों साल के प्रयोग व प्रशिक्षण से परिपूर्ण हुई है। सबकी पढ़ाई भिन्न है। रोग के लक्षणों को जानने के तरीके भिन्न हैंऔर दवाएं भी भिन्न हैं। ऐसे में चार-छह माह की एकदम से भिन्न पढ़ाई करके कोई भी वैकल्पिक चिकित्सक एलोपैथी का मास्टर नहीं हो सकता। ऐसे में एनएमसी विधेयक कानून का दर्जा पाकर न सिर्फ एलोपैथी चिकित्सा को नष्ट करेगाबल्कि आयुर्वेदहोम्योपैथीऔर यूनानी चिकित्सा पद्धतियों का भी भट्ठा बैठाएगा। जब सभी तरह के चिकित्सक एलोपैथी चिकित्सक के समान बन जाएंगेतो मेधावी छात्र अपना समय व कौशल क्यों जटिल बीमारियों का उपचार सीखने में खर्च करेंगे?

एमबीबीएस शिक्षा के साथ कई तरह के खिलवाड़ 

वैसे भी एमबीबीएस और इससे जुड़े विषयों में पीजी में प्रवेश की परीक्षा बहुत कठिन मानी जाती है। एमबीबीबीएस में कुल 67,218 सीटें हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन 1000 की आबादी पर एक डॉक्टर की मौजदूगी अनिवार्य मानता हैलेकिन हमारे यह अनुपात 0.62:1000 है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने राज्यसभा में बताया था कि देश में करीब 20 लाख एलोपैथी चिकित्सकों की कमी है। इसके बावजूद इस कमी की गंभीरता को न समझते हुए एमबीबीएस शिक्षा के साथ कई तरह के खिलवाड़ हो रहे हैं। कायदे से उन्हीं छात्रों को मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलना चाहिएजो सीटों की संख्या के अनुसार नीट परीक्षा से चयनित हुए हैं। लेकिन आलम है कि जो छात्र दो लाख से भी ऊपर की रैंक में हैउसे भी धन के बूते प्रवेश मिल जाता है। यह स्थिति इसलिए बनी हुई हैक्योंकि जो मेधावी छात्र निजी कॉलेज का शुल्क अदा करने में सक्षम नहीं हैंवह मजबूरीवश अपनी सीट छोड़ देते हैं। बाद में इसी सीट को निचली श्रेणी में स्थान पाया छात्र पैसे के बल पर खरीदकर प्रवेश पा जाता है। इस सीट की कीमत 60 लाख से एक करोड़ तक होती है। अपने बच्चों को हर हाल में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश दिलाने की महत्वाकांक्षा रखने वाले अभिभावक यही तरीका अपनाते हैं। देश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एक साल का शुल्क महज 4 लाख हैजबकि निजी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में यही शुल्क 64 लाख रुपये है। यही धांधली एनआरआई और अल्पसंख्यक कोटे के छात्रों के साथ बरती जा रही है। एमडी में प्रवेश के लिए निजी संस्थानों में जो प्रबंधन के अधिकार क्षेत्र और अनुदान आधारित सीटें हैंउनमें प्रवेश शुल्क की राशि 2 करोड़ से 5 करोड़ है। इसके बावजूद सामान्य प्रतिभाशाली छात्र के लिए एमएमबीबीएस परीक्षा कठिन बनी हुई है।

एनएमसी के प्रस्तावित विधेयक में इस संस्था को न्यायालय की तरह विवेकाधीन अधिकार भी दिये गये हैं। इसे ये अधिकार भी हैं कि यह चाहे तो उन चिकित्सकों को भी मेडिसन और शल्यक्रिया की अनुमति दे सकती हैजिन्होंने लाइसेंशिएट परीक्षा पास नहीं की है। जबकि एमबीबीएस पास छात्रों को भी प्रेक्टिस शुरू करने से पहले यह परीक्षा पास करनी होती है। इस विधेयक में निजी महाविद्यालयों में 60 प्रतिशत सीटें प्रबंधन को अपनी मनमर्जी से भरने की छूट दी गयी है। जाहिर हैतब केवल 40 फीसदी सीटें ही प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से भरी जाएंगी।

साफ हैप्रबंधन अपने अधिकार क्षेत्र में आयी 60 प्रतिशत सीटों की खुल्लम-खुल्ला नीलामी करेगा। ऐसी स्थिति में प्रवेश के लिए राशि किन आंकड़ों को छुएगीफिलहाल कहना मुश्किल है। इसीलिए इस विधेयक के पारित होने से पहले ही इसका असर पीजी सीटें खाली रह जाने के रूप में दिखने लगा है। यह स्थिति देश की भावी स्वास्थ्य सेवा को संकट में डालने के स्पष्ट संकेत दे रही है। विधेयक लाना ही था तो इसमें चिकित्सा शिक्षा में ऐसे सुधार दिखने चाहिए थेजिससे इसमें धन से प्रवेश के रास्ते बंद होते।

हालांकि मेडिकल की सीटें खाली रह जाने की स्थिति को देखते हुए सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में पीजी पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए भारत सरकार ने न्यूनतम अंक कम कर दिये हैं। अब अनारक्षित श्रेणी में 35 व आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के 25 परसेंटाइल लाने पर भी उन्हें एमडी/एमएस कोर्स में दाखिला मिल जाएगा। अभी तक यह क्रमश: 50 और 40 परसेंटाइल था। साथ ही सप्रीम कोर्ट के निर्देश पर काउंसलिंग की तारीख बढ़ाकर भी खाली सीटों को भरने की कवायद की जा रही हैलेकिन इसका भी कोई खास असर नहीं दिख रहा। उत्तर प्रदेश में तो एमबीबीएस और बीडीएस की भी लगभग 40 प्रतिशत सीटें खाली पड़ी हैं। पोस्ट ग्रेजुएट यानी पीजी की हालत तो और भी दयनीय है और यह मसला हर जगह हैहर सूबे में। 

 

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