केंद्र सरकार शिक्षा में वाजिब गति से काम नहीं कर पाई। शिक्षा से जुड़े कई मसले तो कोर्ट तक पहुंच गए। बड़े पदों पर नियुक्तियों पर भी विवाद सामने आए। पिछले चार साल में एजुकेशन के क्षेत्र में विवाद की खबरें ही फोकस में रहीं हैं, लेकिन कुछ हासिल भी हुआ। एक विश्लेषण…..

 

विकास पाण्डेय

एक तरफ सरकार भारतीय शिक्षा व्यवस्था को विश्व के स्तर का बनाने की बात कहती है, दूसरी तरफ उसके ही मंत्री वैज्ञानिक मान्यताओं के बरक्स वेदों और पुराणों की अवधारणा को शिक्षा में स्थापित करने का विचार रखते हैं। ऐसे में आप कैसी शिक्षा नीति बनायेंगे, समझ में आसानी से आ जाता है। वैसे भी सिर्फ नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट बना देने से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरने वाला। वाकई शिक्षा का स्तर सुधारना है, तो रियल ग्राउंड पर जाकर पॉलिसी को बदलने की पहल करनी चाहिए। शिक्षाविदों से नहीं, शिक्षार्थियों से बात कर शिक्षा नीति बनानी चाहिए, शिक्षा के क्षेत्र में कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए।

पहले बात करेंगे बीजेपी के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र की, फिर मोदी सरकार से कहां चूक गई, और अंत फिर चर्चा करेंगे भारत की लर्निंग से संबंधित समस्या पर वर्तमान में मौजूद पर्याप्त आंकड़े और साक्ष्यों की। यह सही समय है कि बच्चों के लर्निंग परिणामों की गुणवत्ता में सुधार के लिये प्रभावी विकेंद्रीकृत कार्रवाई की जाए। 

क्या नहीं मिला?

मोदी सरकार को चार साल पूरे हो गये हैं। इस मौके पर बहुत सारे उत्सव भी मनाये गये, पर शिक्षा की उम्मीदों के रंग उड़े-उड़े से नजर आये। इस मौके पर भी पश्चिम बंगाल में पीएम मोदी ने फिर से देश की शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए 1 लाख करोड़ खर्च करने का दावा कर दिया। हालांकि यह घोषणा पहले भी कई मंचों से पीएम मोदी और उनके मंत्री कर चुके हैं। 2014 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में भी देश की शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए रिसर्च और वोकेशनल एजुकेशन को बढावा देने की घोषणा की गई थी। चार साल बाद भी यह घोषणा पूरी नहीं हो पाई है। इसके लिए आज तक नई शिक्षा नीति तैयार नहीं हो पाई है।

स्कूली शिक्षा के विकास को लेकर एक ऊहापोह की स्थिति

2014 के बाद, इन चार साल में सरकार नई शिक्षा नीति भी नहीं तैयार कर पाई है। इसके लिए पहले तो एक मंत्री ने एक समिति बना दी, वो हटीं तो दूसरे आये मंत्री जी ने दूसरी समिति बना दी, समिति पर समिति बनती रहीं और अभी तक नतीजा शून्य ही रहा है। अब चार साल बाद मोदी सरकार का फिर मूड बदला है, वह चाहती है कि क्वालिटी एजुकेशन, इनोवेशन एवं रिसर्च पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने वाली नई शिक्षा नीति लाई जाए।

नई सरकार और इसके नेता हमेशा से नैतिक शिक्षा की आवश्यकता पर अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं। कारण, उनकी नजर में इससे ही छात्रों को बेहतर नागरिक बनाया जा सकता है। लिहाजा, पहले से ही संभावना जताई जा रही थी कि नई शिक्षा नीति में इसका समावेश जरूर होगा। और वह है भी। लेकिन नैतिक शिक्षा के अलावा ज्योतिष, कर्मकांड और परम्पराओं के अध्ययन को इसमें शामिल करने को लेकर संभव है कि विरोध में भी स्वर उठे। वैसे भी इस सरकार पर विज्ञान के बजाय धार्मिक कर्मकांडों को बढ़ावा देने के आरोप पहले से लगते रहे हैं। ऐसे में बहुतों की नजर में नई शिक्षा नीति और सरकार की मंशा को लेकर सवाल भी हैं।

अभी कितनी और बनेंगी समितियां ?

तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी

इसकी शुरुआत साल 2015 से हुई। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने नई शिक्षा नीति बनाने के लिए पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। इस समिति ने एक नई एजुकेशन पॉलिसी का एक ड्राफ्ट तैयार किया। हालांकि तत्कालनी मंत्री स्मृति ईरानी ने इसे सार्वजनिक भी किया था।

लेकिन स्मृति ईरानी के एचआरडी मंत्रालय छोड़ने के बाद नये बने एचआरडी मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जून, 2017 में नई शिक्षा नीति तैयार करने के लिए अंतरिक्ष वैज्ञानिक कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक नई समिति के गठन की घोषणा की। इस तरह पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली समिति ने इस नीति का जो मसौदा तैयार किया था, वह एक तरह से ठंडे बस्ते में चला गया।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर

सरकार के कार्यकाल को महज 1 साल बचा है और अब जावडेकर जी कह रहे हैं नई शिक्षा नीति आने में अभी 3 महीने तो लग ही जाएंगे। तीन महीने पहले उन्होंने कहा था, ‘हम नई शिक्षा नीति पर काम कर रहे हैं और लोगों से इसके लिए सुझाव मांगे गए थे। एक महीने में इसका प्रारूप तैयार हो जाएगा और तीन महीने में नीति तैयार हो जाएगी।’

केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह

जबकि केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह कहते हैं, ‘नई शिक्षा नीति में शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने पर ही विचार किया गया है ताकि उसे बदलते समय के अनुकूल बनाया जा सके। इसमें हर उन खामियों को दूर करने का प्रयास किया जाएगा, जो शिक्षा को उसका उद्देश्य पूरा करने में बाधक बन रही है। हमारा इरादा भारत में विश्वस्तरीय शिक्षा पद्धति तैयार करने का है, ताकि शिक्षा सुलभ, सस्ती और लोगों की पहुंच के दायरे में आये। शिक्षा की गुणवत्ता स्कूली स्तर से उच्चतर स्तर तक बेहतर हो ताकि देश में न सिर्फ ज्यादा से ज्यादा इंजीनियर, वैज्ञानिक, डॉक्टर पैदा किए जा सकें बल्कि वे एक बेहतर नागरिक के तौर पर उभरें। हमारा मानना है कि शिक्षा ऐसी हो जो मस्तिष्क को ज्ञान, हृदय को भाव-करुणा और हाथ को काम दे।’

बताया जा रहा है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में शिक्षा को सुलभ, गुणवत्तापूर्ण और रोजगारपरक बनाने पर जोर दिया गया है। हालांकि इससे पहले पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन की अध्यक्षता में गठित कमिटी के मसौदे में भी इन बातों का जिक्र था और जिसकी रिपोर्ट को बाद में ठंडे बस्ते में डाल कर के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नई कमिटी के गठन का ऐलान कर दिया गया था, लेकिन इस बार उन मुद्दों को समायोजित करते हुए भारतीय शिक्षा नीति को नये सिरे से गढ़ने का प्रयास किया गया है।

डाॅ. विनय सक्सेना

शिक्षाविद् डाॅ. विनय सक्सेना कहते हैं, ‘दुर्भाग्यवश आज शिक्षा को इवेंट बेस्ड बनाने पर ही जोर दिया जा रहा है। छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से दूर किया जा रहा है। उन्हें सोशल मीडिया के ताने-बाने में फंसाया जा रहा है। इससे कभी भी छात्रों का मानसिक और बौद्धिक विकास नहीं हो पायेगा, बल्कि हमारा समाज अपंगता की ओर ही बढ़ेगा। इसे ऐसे भी मान सकते हैं पर अगर आप 2 साल के कोर्स को 4 साल का करते हैं तो इसका मतलब हुआ कि आपने इसकी अवधि 200 प्रतिशत बढ़ा दी। सवाल उठता है कि आपने ऐसा क्या किया जिससे 200 प्रतिशत ज्यादा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी मिले? प्रशिक्षण संबंधी पाठ्यक्रम में भी असली कमी की ओर सरकार का ध्यान क्यों नहीं जाता है, महज समयावधि घटाने-बढ़ाने का काम हो रहा है।’

अब कस्तूरीरंगन समिति तैयार कर रही नई नीति

जून 2017 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति पर काम करने के लिए अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक 9 सदस्यीय समिति गठित की। इस समिति में विभिन्न विशेषज्ञता और शैक्षणिक योग्यता वाले लोगों को शामिल किया गया है। समिति नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बारे में शिक्षाविदों, छात्रों, विशेषज्ञों और अन्य लोगों से एचआरडी मंत्रालय को मिले हजारों सुझावों और राज्य सभा व राज्यों में चर्चा के दौरान सामने आई बातों पर गौर करेगी।

देश में शिक्षा के हालातों पर सोशल मीडिया के माध्यम से आम लोगों की राय जानने पर मोदी सरकार के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया मिली हैं। 71.9 फीसदी छात्रों ने सरकार पर सवाल खडे किए हैं। ‘नेशनल मल्टी स्किल मिशन के तहत् रोजगार देने के सरकार के वादों को भी छात्रों ने निराधार बताया। 16 फीसदी स्टूडेन्ट्स ने कहा कि रिसर्च और वोकेशनल पढ़ाई को बढावा देने का मोदी सरकार का वादा भी झूठा साबित हुआ। छात्रों ने तो विश्वविद्यालयों में टीचर्स की व्यापक कमी भी बताई। समय की मांग है, आज शिक्षा को भी व्यावहारिक बनाने की जरूरत है, औपचारिक नहीं। इसके लिए नई शिक्षा नीति में असली मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, अध्ययन का स्तर बढ़ाने की कवायद करनी चाहिए न कि हवा-हवाई तरीके से, बिना गहराई में जाए बेकार की नीतियां और समितियां बनानी चाहिए।

देश ने क्या हासिल किया?

शिक्षा क्षेत्र के लिए यह वर्ष ऐतिहासिक है क्योंकि जो बच्चे अभी आठवीं कक्षा में हैं, वे आरटीई अधिनियम (अप्रैल 2010 से लागू) का लाभ पाने वाले पहली पीढ़ी के हैं। इनमें से अधिकांश बच्चों ने न केवल विद्यालय में नामांकन कराया बल्कि स्कूल प्रणाली में न्यूनतम आठ वर्ष पूरा किया है। इस प्रकार हम एक बेहतर स्थिति में हैं कि इस पर गंभीरता से विचार करें कि आठ वर्षों की इस स्कूली शिक्षा से हमारी क्या अपेक्षा है और बच्चों में इससे किस प्रकार की क्षमता का विकास हुआ।

दूसरा, अब हमारे पास बच्चों की लर्निंग पर दो नए स्रोतों के आंकड़े उपलब्ध हैं। एक आंकड़ा एएसईआर रिपोर्ट 2017 से प्राप्त हुआ है जबकि दूसरा आंकड़ा ‘नेशनल अचीवमेंट सर्वे (एनएएस)’ द्वारा जारी किया गया है। इस वर्ष का एएसईआर आंकड़ा सामान्य सर्वेक्षण से अलग रहा क्योंकि यह 14-18 आयुवर्ग पर केंद्रित था। इस प्रकार इस बार जनसंख्या के एक विशेष हिस्से को लक्षित किया गया, जैसा सामान्य सर्वेक्षण में नहीं होता था।

इस बार एक अलग प्रयास यह भी हुआ कि सामान्य सर्वेक्षण में देश के सभी ग्रामीण जिलों में सर्वेक्षण के विपरीत इस बार प्रत्येक राज्य के एक-दो जिलों को लक्षित किया गया। एएसईआर 2017 के ‘बियॉन्ड बेसिक्स’ मूल्यांकन ढांचे के अंतर्गत यह पता लगाया गया कि साक्षरता व संख्या ज्ञान से संलग्न रोजमर्रा के कार्यों में युवा कितने सक्षम हैं। यह, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के लर्निंग आउटकम दृष्टिकोण के अनुरूप है, जहां दैनिक जीवन और गणितीय सोच के बीच के संबंध के विकास पर जोर दिया जाता है। अपने सामान्य अभ्यास से अलग दृष्टिकोण अपनाते हुए इस बार एनएएस रिपोर्ट ने बच्चों के प्रदर्शन का मूल्यांकन पाठ्यक्रम या परीक्षा प्राप्तांक की बजाय विभिन्न वृहत् दक्षताओं के आधार पर किया।

वर्ष 2017 के ये दोनों आंकड़े (एक सरकारी, दूसरा गैर-सरकारी) बच्चों के लर्निंग परिणामों के संबंध में मौजूद दृष्टिकोण में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देते हैं। दोनों सर्वेक्षण अपने-अपने तरीके से चरण-वार लर्निंग परिणामों पर विचार करने के महत्त्व को इंगित करते हैं और यह दृष्टिकोण कक्षा-वार पाठ्यक्रम अपेक्षाओं के संबंध में अतिआवश्यक पुनर्विचार को अवसर देता है।

गौरतलब है कि इन दोनों अध्ययन रिपोर्टों से उपलब्ध सूचनाएं वर्तमान विद्यालय वर्ष की ही हैं। प्रत्येक वर्ष एएसईआर उसी विद्यालय वर्ष के आंकड़े जारी करता है जिस वर्ष मूल्यांकन किया गया है। इस बार सरकार के एनएएस आँकड़े ने भी यही दृष्टिकोण अपनाया, जो प्रशंसनीय है।

दोनों अध्ययन भारत में बच्चों के लर्निंग परिणामों के बारे में महत्त्वपूर्ण सूचनाएं देते हैं।

पिछले एक दशक में इन दोनों अध्ययनों के बीच के अंतर पर भी बहुत बहस हुई है। किन्तु, फिर भी मूल तथ्य यह ही है कि दोनों अध्ययन भारत में बच्चों के लर्निंग परिणामों के बारे में महत्त्वपूर्ण सूचनाएं देते हैं। यही दोनों अध्ययन आँकड़े उपलब्ध कराने में नियमित भी रहे हैं (एनएएस समय-समय पर अपने आँकड़े देता रहता है, जबकि एएसईआर हर वर्ष अपनी रिपोर्ट जारी करता है)। विभिन्न शोधकर्त्ता एएसईआर आँकड़ों का उपयोग और विस्तृत विश्लेषण के लिये करते रहे हैं और प्रकाशित रिपोर्ट के निष्कर्षों से भी आगे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं। विभिन्न वर्षों के आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन से प्रगति की निगरानी और विभिन्न प्रकार के निरंतर अंतरालों की पहचान में सहायता मिली है।

तीसरा, जिला-स्तरीय आंकड़े अब उपलब्ध हैं। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सरकार की शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत योजना, आवंटन व कार्यान्वयन के लिये जिले को ही इकाई के रूप में केंद्र में रखा जाता है। इनपुट्स या आधारभूत संरचना के बारे में सूचनाएं वार्षिक रूप से जिला-स्तर पर ही उपलब्ध होती हैं। हालांकि, इस वर्ष से पहले तक बच्चों के लर्निंग परिणामों के बारे में मात्र एएसईआर का ही जिला-स्तरीय आंकड़ा उपलब्ध था। एएसईआर ने जिला-स्तरीय आंकड़ों के सृजन में योगदान इसी आशय से किया ताकि जिला को इकाई के रूप में रखकर लिये जाने वाले निर्णयों में सहायता की जा सके। एनएएस का जिला रिपोर्ट कार्ड भी समय पर जारी हुआ है जो स्वागतयोग्य है। अब किसी राज्य के सब जिलों के पास यह अवसर होगा कि वे अपने बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रासंगिक व उपयुक्त योजनाओं का निर्माण कर सकें।

इन तीन महत्त्वपूर्ण मील के पत्थरों को देखते हुए हम कह सकते हैं कि भारत एक ऐसी बेहतर स्थिति में है कि वह सार्वभौमिक स्कूली शिक्षा से अब सार्वभौमिक प्रज्ञता (लर्निंग फॉर आल) की ओर आगे बढ़ने के लिये प्रभावी नए तरीकों पर विचार करे। शिक्षा के संबंध में योजना प्रक्रिया की वार्षिक प्रकृति तब उपयोगी होती है जब इसे इनपुट्स उपलब्ध होता रहे। लेकिन जब हमारा ध्यान ‘स्कूल तक पहुंच’ से बढ़ता हुआ ‘लर्निंग सुनिश्चितता’ की ओर जा रहा है, तब कार्यान्वयन के लिये बहुवर्षीयता की आवश्यकता होती है।

 

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