शिक्षा में सुधार पर साजिश की तलवार!

क्या वाकई आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प कर दिया है? क्या वाकई यहां के सरकारी स्कूलों की तस्वीर पूरी तरह बदल गयी है? और क्या वाकई इससे डर कर केंद्र की मोदी सरकार दिल्ली के एजुकेशन सिस्टम को ठप करने की साजिश रच रही है? ऐसे तमाम सवालों की पड़ताल कर रही है यह खास रिपोर्ट।

रईस अहमदलाली

हाल ही में दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने केंद्र की मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि वह दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को ठप करने की साजिश रच रही है। उन्होंने कहा है कि आम आदमी पार्टी के शासनकाल में दिल्ली में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आये हैं और इससे घबराकर केंद्र की भाजपा सरकार उसे पटरी से उतारने की कोशिश कर रही है। सिसोदिया के अनुसार आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ की सरकार ने दिल्ली में अपने पिछले तीन साल के कार्यकाल में एजुकेशन सिस्टम को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में कई बड़े काम हुए हैं, कई ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं जिससे सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदल गयी है। वहीं भाजपा शासित किसी भी राज्य सरकार में शिक्षा में सुधार नहीं हुआ, बल्कि वहां सरकारी स्कूल या तो बंद हुए हैं या बंदी के कगार पर हैं। यही वजह है कि देश में स्कूल-कॉलेजों को बर्बाद करने वाली मोदी सरकार दिल्ली में एजुकेशन सिस्टम को बर्बाद करना चाहती है।

आरोप और प्रत्यारोप

मनीष सिसोदिया ने यह आरोप ऐसे वक्त में लगाया है, जब केंद्र सरकार की तरफ से शिक्षा में सुधार के गंभीर कदम उठाने के दावे किये जा रहे हैं। देश के लिए नयी शिक्षा नीति लाने की कवायद हो रही है। जबकि मनीष सिसोदिया का कहना है कि शिक्षा में सुधार की गंभीर पहल तो दिल्ली सरकार कर रही है, जिसके नौ सलाहकारों को हटाने का फरमान सुनाकर उस पहल को राह से भटकाने का काम केंद्र सरकार ने किया है। चूंकि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में सुधार में उनकी सलाहकार आतिशी मार्लेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसलिए केंद्र की मोदी सरकार ने खासकर उन्हें निशाना बनाया है। शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया का स्पष्ट आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को खत्म करने की ठान ली है, इसीलिए नित नये फरमानों से दिल्ली सरकार के समक्ष मुसीबतें खड़ी करने का प्रयास कर रहे हैं। चाहे वह सलाहकारों की नियुक्ति रद्द करने का आदेश हो या फिर छात्रों को लोन की सुविधा पर रोक लगाने की कोशिश।

कायाकल्प: ये सरकारी स्कूल ही है

कहने का तात्पर्य कि केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच अर्से से चला आ रहा टकराव एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इससे अचानक दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था भी चर्चा में आ गयी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आये हैं? क्या वाकई आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदल दी है? क्या दिल्ली में शिक्षा की गुणवत्ता, खासकर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर उल्लेखनीय तौर पर सुधर गया है? और यह भी कि आखिर एक रुपये महीने की तनख्वाह लेने वाली शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की सलाहकार आतिशी मार्लेना ने इस बदलाव में कितनी और कैसी भूमिका निभाई है कि उनके जाने से शिक्षा व्यवस्था में सुधार को बड़ा धक्का लगने की बात कही जा रही है?

शिक्षा व्यवस्था में बदलाव

कुशल कारीगर: मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री व शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया

यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश के दूसरे राज्यों के सरकारी स्कूलों की तरह पहले दिल्ली के सरकारी स्कूलों की भी बदहाली और शिक्षा के स्तर को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। अक्सर ये स्कूल अपनी नकारात्मक खबरों को लेकर ही सुर्खियों में रहते थे। लेकिन जब से यहां आम आदमी पार्टी की सरकार बनी और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली, दिल्ली के सरकारी स्कूल अधिकांशत: सकारात्मक खबरों के कारण ही चर्चा में रहे हैं। जहां सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की दुर्दशा को लेकर रोना रोया जाता हो, वहां पिछले दिनों दिल्ली के सरकारी स्कूलों के 12 छात्रों का प्रतिष्ठित आईआईटी परीक्षा का मेन्स क्वालीफाई करना सुखद अहसास देता है। दरअसल, शुरू से ही दिल्ली सरकार ने स्वास्थ्य के साथ शिक्षा को अपने एजेंडे में प्राथमिक वरीयता में बनाये रखा है। शुरू से ही सरकार लोगों के बीच जाकर शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए सलाह मांगती रही है और जरूरी सलाहों को स्कूलों में लागू भी किया है। इस कार्य को पुख्ता तरीके से करने के लिहाज से ही शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने सेंट स्टीफंस और आॅक्सफोर्ड से पढ़ी आतिशी मार्लेना को अपना सलाहकार बनाया था। आतिशी पिछले तीन साल से एक रुपये की महीने की सैलरी पर काम रही थीं, जिन्हें इस पद से हटाने के लिए पिछले दिनों केंद्र सरकार ने आदेश जारी किया। इस आदेश के बाद दोनों सरकारों के बीच वाद-विवाद भी बढ़ा है।

बहरहाल, यहां इस बात की पड़ताल जरूरी है कि आखिर आम आदमी पार्टी के तीन साल के कार्यकाल में दिल्ली के शिक्षा परिदृश्य में क्या बदलाव आये हैं। क्या यह वाकई एक मॉडल के तौर पर उभरा है, जिसे दूसरे राज्यों को भी अनुसरण करने की जरूरत है?

हुआ सुधार, है इकरार

शिक्षाविद दयानंद वत्स कहते हैं, ‘इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली की मौजूदा सरकार शिक्षा को लेकर गंभीर है और हाल के वर्षों में दिल्ली में शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आये हैं। सरकार की इस मसले पर गंभीरता इस बात से भी समझ में आती है कि उसने अपने कुल बजट का 25 प्रतिशत धन शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता में सुधार के लिए खर्च करने की बात कही है। एक और बात सुकूनदेह यह है कि राज्य के शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री लगातार सरकारी स्कूलों का बारीकी से मुआयना भी करते रहते हैं। बच्चों और अभिभावकों से वे सीधा संवाद करते हैं, व्यवस्थाओं का अच्छी तरह से निरीक्षण करते हैं। अगर सरकारें इस ढंग से किसी क्षेत्र पर ध्यान दे, तो उसके अच्छे नतीजे आना स्वाभाविक है। नि:संदेह इसी वजह से दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षा के अनुकूल वातावरण बना है, बेहतरीन पढ़ाई संभव हो पायी है।’

सुधार से सब सहमत: सरकारी स्कूल का क्लासरूम

दयानंद वत्स की तरह ऐसे कई लोग हैं, जो यह मानते हैं कि दिल्ली सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य किया है। एक उदाहरण प्रस्तुत किया है कि अगर काम में गंभीरता हो, इरादे नेक हों तो किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। गौरतलब है कि हाल ही में वित्त वर्ष 2018-19 के लिए पेश किये अपने 53 हजार करोड़ रुपये के बजट में दिल्ली सरकार ने 13997 करोड़ रुपये शिक्षा के लिए आवंटित किये हैं। यानी सरकार ने अपने कुल बजट का 26 प्रतिशत धन शिक्षा पर खर्च करने का फैसला किया है। पिछले साल भी उसने 48 हजार करोड़ रुपये के बजट में लगभग 12 हजार करोड़ रुपये शिक्षा के मद में रखे थे। इस बार शिक्षा के लिए आवंटित बजट की राशि से सरकार ने शैक्षिक ढांचे में वृद्धि की योजना बनायी है। उसका इरादा इन पैसों से लगभग 13 हजार नये क्लासरूम बनाने, स्कूलों में एक लाख 20 हजार सीसीटीवी यानी हर स्कूल में 150-200 कैमरा लगाने, 30 नयी स्कूल बिल्डिंग का निर्माण कराने के अलावा नर्सरी शिक्षा, अर्ली चाइल्डहुड सेंटर्स, नये कॉलेज खोलने का भी है। लाइब्रेरी, मिड-डे मील, स्कूलों में खेलों को बढ़ावा देना, छात्राओं के लिए सेल्फ डिफेंस की क्लास, बच्चों की रीडिंग व मैथ स्किल डेवलप करना, शिक्षकों का प्रशिक्षण, बच्चों को निराशा से बचाने और स्वस्थ मस्तिष्क के निर्माण के लिए नया पाठ्यक्रम लाना भी उसकी प्राथमिकताओं में है। यानी शिक्षा के तमाम पहलुओं पर सरकार की नजर है और वह सम्मिलित रूप से प्रयास कर समग्रता के साथ शिक्षा के स्तर को सुधारने की कोशिशों में लगी है।

बहरहाल यह तो भविष्य में की जाने वाली चीजे हैं, इसका यह कतई मतलब नहीं कि अब तक के अपने कार्यकाल में सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने आतिशी मार्लेना की सलाह पर काम करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में कई ऐसे कदम उठाये, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आज एक बड़ा बदलाव आया है। और खास बात यह है कि यह सब शिक्षा के साथ समाज को जोड़ते हुए किया गया ताकि बदलाव के साथ निरंतरता भी बनी रहे। स्वाभाविक है कि सामाजिक भागीदारी के बिना कोई भी सरकारी प्रयास अपने अंजाम तक कम ही पहुंच पाता है। स्वच्छ भारत अभियान, स्कूल चलें हम जैसी योजनाओं का हश्र किसी से छिपा नहीं है।

ऐसे आया दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव

खैर, यहां बात दिल्ली में शिक्षा व्यवस्था में आये बदलाव की। सबसे पहला बदलाव तो यही है कि अब ऐसा कहते लोग नहीं पाये जाते कि प्राइवेट स्कूलों की तुलना में दिल्ली के सरकारी स्कूल कहीं नहीं टिकते। ज्यादातर लोग अब यह स्वीकार रहे हैं कि बदलाव आये हैं और सरकार अच्छा काम कर रही है। इनमें वे लोग तो शामिल हैं ही, जिनके बच्चे दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और जो इन स्कूलों को बदली हालत में बखूबी देख रहे हैं। ऐसे अभिभावक भी, जिनके बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं, इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि दिल्ली में शिक्षा के स्तर में काफी सुधार आया है। अब इन स्कूलों में बैठने के लिए टेबल-कुर्सी है, प्रॉपर यूनिफॉर्म है, स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्कुल बदल गया है, स्कूल पहले के मुकाबले काफी साफ-सुथरे नजर आने लगे हैं।

सरकारी स्कूलों की हालत सुधरी है

मध्यम दर्जे के पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे एक छात्र के अभिभावक नईम कुरेशी कहते हैं, ‘सरकारी स्कूलों की हालत सुधरी है। अब इन स्कूलों के सामने से गुजरने पर ऐसा महसूस होता है कि हम किसी प्राइवेट स्कूल के सामने हैं। स्कूल की इमारतें भी अच्छी हुई हैं, साफ-सफाई नजर आती है और बच्चे भी पहले के सरकारी स्कूलों जैसे नहीं दिखते। जिनके बच्चे वहां पढ़ते हैं, वे बताते हैं कि अब वहां पैरेंट-टीचर मीटिंग भी होने लगी है। मेरे कुछ जानने वाले तो अपने बच्चों के स्कूल की मैनेजमेंट कमेटी के मेंबर भी बनाये गये हैं। इस साल कई पैरेंट्स ने अपने बच्चों का नाम पब्लिक स्कूल से कटवाकर उन्हें दिल्ली के सरकारी स्कूलों में दाखिल करवाया है। अगर ऐसा रहा तो आगे मैं भी अपने बच्चों का दाखिला वहां कराने की सोचूंगा। अगर किफायत में अच्छी शिक्षा मिले, तो सरकारी स्कूल क्या बुरा है।’

जो पहली बार हुआ

स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एसएमसी): पिछले तीन सालों में दिल्ली सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कई ऐसे फैसले लिए हैं, जो पहले की सरकारों के कार्यकाल में मीटिंग और फाइलों से बाहर ही नहीं निकले। मसलन स्कूल मैनेजमेंट कमेटी यानी एसएमसी। पहले स्कूल केवल सरकारी तंत्र का हिस्सा बने रहे, सामाजिक भागीदारी नगण्य रही। पहली बार दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूलों में सामाजिक भागीदारी तय करने के लिए सभी स्कूलों में मैनेजमेंट कमेटियों के माध्यम से समाज के लोगों और अभिभावकों को इस तंत्र से जोड़कर स्कूलों में अनुकूल माहौल देने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में उनकी भूमिका तय की।

स्वयं सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल इस बात को स्वीकार करते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में स्कूल मैनेजमेंट कमेटी एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। वे कहते हैं कि तीन साल पहले लोग मजबूरी में अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते थे, लेकिन सभी के प्रयासों से दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बदलाव आया और आज लोग अपनी स्वेच्छा से अपने बच्चों का इन स्कूलों में दाखिला करवा रहे हैं। वे इस बदलाव में एसएमसी की भूमिका को सबसे अहम मानते हैं। बाकायदा इसे और तार्किक बनाने के उद्देश्य से एसएमसी एप भी लांच किया गया है ताकि मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य स्कूल से जुड़ी जानकारी व शिकायत तत्काल कर सकें और उसका तय समय में निदान करवा सकें। शिक्षा विभाग को सरकार की तरफ से स्पष्ट निर्देश दिये गये हैं कि शिकायतों का तत्काल निपटारा सुनिश्चित करे। जाहिर है यह एक बड़ा और क्रांतिकारी कदम है, क्योंकि एक अभिभावक बेहतर तरीके से अपने बच्चे की शिक्षा की जरूरतों और इसके लिए किये जाने वाले आवश्यक बदलाव को समझ सकता है। और अगर उसे इन बदलावों का हिस्सा बना दिया जाए, उसके सुझाव-शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई हो तो नतीजे बेहतर आएंगे ही।

पैरेंटटीचर मीटिंग्स (पीटीएम): स्कूल में अभिभावक-शिक्षक बैठकों का आयोजन मुख्यत: पब्लिक स्कूलों का चलन रहा है। सरकारी स्कूलों में ऐसा कहीं नहीं होता। लेकिन पहली बार दिल्ली सरकार ने अपने स्कूलों में बड़े स्तर पर इसे शुरू किया। अब प्रत्येक शुक्रवार को नियमित रूप से मेगा पीटीएम के तहत अभिभावक-शिक्षक बैठकों का आयोजन होता है, जहां पैरेंट्स अपने बच्चों की परेशानियां डिस्कस करने आते हैं। शिक्षक उनकी बात सुनते हैं और उनकी शिकायतों का समाधान करते हैं। शिक्षा विभाग द्वारा बाकायदा पीटीएम के लिए दिशा-निर्देश भेजे गये हैं। अभिभावकों के समूह को कुछ जिम्मेदारियां भी सौंपी गयी हैं। उनसे कहा गया है कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के काम में अपनी भागीदारी के लिए वे रास्ते सुझाएं, चाहे उनकी खुद की शैक्षिक पृष्ठभूमि कोई भी हो। शिक्षक हर बच्चे की प्रगति रिपोर्ट उसके अभिभावक को देते हैं। अभिभावको को इससे पता चलता है कि उनका बच्चा कहां तक पहुंचा है।

कायाकल्प: हां, ये सरकारी स्कूल ही हैं

उत्कृष्ट विद्यालय (स्कूल आॅफ एक्सीलेंस) की शुरुआत: पिछले साल बजट में किये अपने वादे पर खरा उतरते हुए दिल्ली सरकार ने द्वारका, कालकाजी, रोहिणी, खिचड़ीरपुर, मदनपुर खादर में पांच नये स्कूल आॅफ एक्सीलेंस यानी उत्कृष्ट विद्यालयों की शुरुआत की है। अभी हाल ही में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने द्वारका के सेक्टर 22 में एक उत्कृष्ट विद्यालय का उद्घाटन किया है। अंग्रेजी माध्यम के इन स्कूलों में सभी सुविधाएं हैं। बड़ी और भव्य इमारत, लिफ्ट, आर्ट रूम, स्पोर्ट्स एवं एनसीसी रूम, खेलों के लिए बढ़िया मैदान, लाइब्रेरी, कंप्यूटर रूम, आधुनिक शौचालय आदि। शिक्षक भी यहां काफी काबिल रखे गये हैं। सरकार का इरादा भविष्य में दिल्ली के सभी 29 जोन में ऐसे कम से कम एक स्कूल खोलने का है। इन स्कूलों में सरकारी स्कूलों के ही कुछ प्रतिभाशाली छात्रों को दाखिला दिया जाएगा, ताकि उनकी प्रतिभा को और निखारा जा सके। दिल्ली में इस तरह सरकारी स्कूलों को 4 वर्गों में बांट दिया गया है- उत्कृष्ट विद्यालय, राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय एवं राजकीय विद्यालय। उत्कृष्ट विद्यालय सभी दृष्टिकोण से एक आदर्श स्कूल हैं, जिनमें 34 क्लासरूम हैं और 1245 छात्र।

शिक्षकों से दूसरा काम नहींं: दिल्ली पहला ऐसा राज्य बना है, जहां शिक्षकों से सिर्फ बच्चों को पढ़ाने और शिक्षा के लिए काम करने को कहा गया है। उनसे चुनाव में ड्यूटी कराना बंद कर दिया गया है, ताकि वे अपना ध्यान बच्चों के भविष्य पर केंद्रित कर सकें। नॉन टीचिंग वर्क के बोझ से मुक्ति दिलाकर शिक्षकों को पूरी तरह शिक्षा के लिए काम करने के लिए लगाने का ही परिणाम है कि अब स्कूलों में शिक्षक नजर भी आते हैं और बच्चों को इसका लाभ भी मिल पा रहा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पहले या तो शिक्षक स्कूल में नजर ही नहीं आते थे या फिर पढ़ाने में उनकी दिलचस्पी नहीं होती थी। सरकार ने दूसरे कामों में लोगों की कमी की पूर्ति अपने शासकीय कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति से पूरी की है। इतना ही नहीं शिक्षकों की नियुक्ति भी इतनी तेज गति से की गयी कि आज स्कूलों की सभी रिक्तियां भर दी गयी हैं। संभवत: दिल्ली देश का एकमात्र राज्य होगा जहां शिक्षकों के पद रिक्त नहीं हैं। सरकार गेस्ट टीचरों के जरिए ऐसा करने में सफल हुई। उसका इरादा इन्हें परमानेंट करने का भी है, लेकिन उसका कहना है कि इसमें केंद्र सरकार और राज्यपाल की तरफ से रोड़े अटकाये जा रहे हैं। प्रिंसिपल को भी पावर दी गयी कि अगर टीचर छुट्टी पर गया है, तो वे पार्ट टाइम टीचर का इंतजाम कर सकता है। पहले इसके लिए सरकारी फाइल भेजनी पड़ती थी।

सुविधाएं भी बढ़ीं: सरकारी स्कूल में स्वीमिंग पूल

बुनियादी ढांचे में बदलाव: तीन साल पहले तक दिल्ली के सरकारी स्कूल भी दूसरे राज्यों के सरकारी स्कूलों की तरह ही बदहाल थे। ‘आप’ सरकार ने सत्ता में आने पर न सिर्फ नये स्कूल भवनों का निर्माण कराया, बल्कि मौजूदा स्कूलों की इमारतों का भी जिर्णोद्धार किया। बीते सत्र में जहां लगभग डेढ़ दर्जन नये राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय खोले गये, वहीं 5 उत्कृष्ठ विद्यालयों की भी शुरुआत की गयी है। इसके अलावा अब तक 8000 नये स्कूल क्लास रूम बनाये जा चुके हैं। आने वाले दिनों में 12000 और कमरों का निर्माण कराया जाना है। पब्लिक स्कूलों को चुनौती दे रहे उत्कृष्ट विद्यालय तो सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हैं ही, दूसरे सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे में भी क्रांतिकारी परिवर्तन किये गये हैं और यह सिलसिला जारी है। स्कूलों को सीसीटीवी कैमरे से लैस करना, साफ-सफाई की चाक-चौबंद व्यवस्था, लैब, लाइब्रेरी, टॉयलेट, फूल-पौधे, हरियाली भी स्कूलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। यहां तक कि सरकारी स्कूलों में स्वीमिंग पूल तक बनाये गये हैं। कई विद्यालयों में उच्च स्तरीय लाइब्रेरी की सुविधाएं जुटाई गयी हैं, पठन-पाठन सामग्री में भी आधुनिकता का समावेश किया गया है। मेज-कुर्सियां तो जुटाई ही गयी हैं और वह भी ऐसीं कि भ्रम हो कि आप पब्लिक स्कूल में हैं। कहने का तात्पर्य कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों की तस्वीर अब बहुत बदली नजर आने लगी है।

छात्रों को एजुकेशन लोन: दिल्ली देश का एकमात्र ऐसा राज्य बन गया है, जहां किसी भी छात्र को 10 लाख रुपये तक का एजुकेशन लोन  दिया जा सकता है, बिना फालतू के पेपरवर्क के। इस लोन के अंदर फीस, स्कूल का खर्चा, लैपटॉप, हॉस्टल चार्ज सब आयेगा। उल्लेखनीय है कि इस योजना पर राज्यपाल ने सवाल उठाया है, जिस पर सरकार ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के इशारे पर इस योजना में बाधा खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं।

शिक्षणप्रशिक्षण में भी अप्रत्याशित सुधार: ऐसा नहीं है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों का केवल बुनियादी ढांचा ही बदला है, शैक्षिक परिदृश्य में हर जगह बदलाव आये हैं। दिल्ली ही एक मात्र ऐसा सूबा है, जहां अब शिक्षकों की कमी नहीं है। योग्य गेस्ट टीचरों को जोड़कर सरकार ने इस कमी को पूरा कर दिया है। स्कूलों के शिक्षकों को लगातार बेहतर से बेहतर बनाने के लिए उन्हें उच्च स्तर का प्रशिक्षण दिलाया जा रहा है, उनके कौशल का विकास किया जा रहा है। दिल्ली सरकार अपने शिक्षकों को विदेशी संस्थानों में भेज कर वहां पठन-पाठन के परिदृश्य को समझने का उन्हें मौका उपलब्ध करा रही है।

एक मात्र ऐसा सूबा, जहां अब शिक्षकों की कमी नहीं

दरअसल, सरकार ने शिक्षकों के प्रशिक्षण पर खास तौर से फोकस किया है और एक अंतराल पर लगातार वह इसे अंजाम भी दे रही है। टीचिंग मैथड से उन्हें परिचित करवा रही है, क्लासरूम सिनेरियों को हैंडल करने का प्रभावी तरीका उन्हें सिखा रही है। इसी के दृष्टिगत मेंटरशिप प्रोग्राम चलाया जा रहा है, जहां मेंटर्स की सहायता से टीचिंग-लर्निंग वातावरण बनाने के लिए उन्हें स्कूलों में तैनात किया गया है। ये टीचर्स को टीचिंग और बेहतरी से समझाने का काम करते हैं।  बाकायदा इन मेंटर्स को देश-विदेश के शिक्षण संस्थानों में भेजा गया। हाल ही में एक दल सिंगापुर से लौटकर आया है।

इसके साथ ही स्कूलों को लर्निंग आर्गेनाइजेशन में तब्दील करने के लिए स्कूलों के प्रिंसिपल को विशेष प्रशिक्षण दिलवाया जा रहा है। टीचिंग सेशन के लिए उन्हें कैंब्रिज, आॅक्सफोर्ड, फिनलैंड के संस्थानों में भेजा जा रहा है। साथ ही उन्हें विशेष प्रकार के मैनेजमेंट के गुर सिखाने के लिए आईआईएम जैसे देश के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों से टेÑनिंग दिलवायी गयी है। एससीईआरटी  प्रशिक्षण संस्थान के प्रिंसिपल को भी इसमें शामिल किया गया है ताकि शिक्षा के परिदृश्य में पूरी तरह बदलाव आये।

छात्रों को मिलेगा लाभ: नवनीत कुमार, मेंटर टीचर, दिल्ली सरकार

दिल्ली सरकार के मेंटर टीचर नवनीत कुमार कहते हैं, ‘सरकार की नयी और बुनियादी चीजों पर गंभीरता ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार का मार्ग प्रशस्त किया है। प्रशिक्षण संबंधी योजनाओं के कारण टीचर बच्चों की स्थिति को बेहतर समझ पा रहे हैं। बच्चों और शिक्षकों के बीच दूरियां कम हुई हैं। पीटीएम जैसी पहल से भी यह गैप कम हुआ है और शिक्षकों का बच्चों व अभिभावकों से संवाद बढ़ा है। टीचिंग पेडोलॉजी और मैथेडोलॉजी पर चर्चा हुई है, उस पर बहस शुरू हुई है। स्कूल को लर्निंग आॅर्गेनाइजेशन में कनवर्ट करने के प्रयास हुए हैं। ये सकारात्मक हैं। आगे इनके और बेहतर नतीजे सामने आएंगे।’

छात्रों को सशक्त बनाने पर जोर: अब सरकार ने बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के साथ-साथ उस शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने पर भी पूरा ध्यान दिया है। ‘मिशन चुनौती’ और ‘मिशन बुनियाद’ जैसे कार्यक्रम इसी का हिस्सा हैं। इन कार्यक्रमों के तहत बच्चों के लर्निंग गैप यानी अधिगम में कमी को रीडिंग कैम्पेन के जरिये दूर करने का प्रयास किया गया। उन्हें मात्रा और अक्षर ज्ञान, संख्याओं और गणित की भाषा को समझने में कठिनाई से उबारने की कोशिशें की गयीं। विशेष प्रकार की कक्षा लगाकर छात्रों को इस लायक बनाने की कोशिश की गयी कि वे अपने स्तर की चीजों को समझ सकें। जो समझना छूट गया, उन चीजों को समझने का मौका दिलाया गया। जो बच्चे इससे बचे रह गये, उन्हीं के लिए अब मिशन बुनियाद शुरू किया गया है। इसमें प्राथमिक स्तर समेत एमसीडी यानी निगम के स्कूलों को भी शामिल किया गया है। कहने का तात्पर्य कि सरकार दिल्ली के सभी स्कूलों और उनके शिक्षक-छात्रों की बेहतरी का प्रयास कर रही है। हर स्कूल और क्लास में कमजोर छात्रों पर ध्यान देने के लिए शीट बनायी गयी है ताकि इसका स्टेटस शिक्षा मंत्री तक भी पहुंचता रहे।

ये पहल भी अद्वितीय: दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में वाकई बड़े काम किये हैं। फेहरिस्त लम्बी है। ऊपर कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की गयी। लेकिन इसके अलावा भी कई उल्लेखनीय कार्य किये गये हैं। मसलन प्री-प्राइमरी स्कूलों में नर्सरी की कक्षा का प्रबंध, स्कूलों में इस्टेट मैनेजर रखने का फैसला ताकि शिक्षकों को प्रशासनिक काम करने में वक्त जाया न करना पड़े, समर प्रोग्राम की शुरुआत, एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी की व्यवस्था, खेल पाठ्यक्रम समेत कई नये पाठ्यक्रम की शुरुआत, एक्स्ट्रा क्लासेस लगाना, लाइब्रेरी हर स्कूल में, हर स्कूल में प्ले कॉर्नर, एनजीओे को जोड़ना।

मिलकर बनाया मिसाल: मनीष सिसोदिया और आतिशी मार्लेना

यहां शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की सलाहकार रहीं आतिशी मार्लेना का जिक्र जरूरी है, जिनके सतत प्रयासों और सलाह से बहुत कुछ संभव हो सका। भले ही वह आम आदमी पार्टी से जुड़ी हैं, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि पर संदेह नहीं किया जा सकता। सेंट स्टीफंस और आॅक्सफोर्ड से पढ़ीं आतिशी पहले शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ी रही थीं। उनके माता-पिता भी दिल्ली विश्वविदलय में प्रोफेसर रहे हैं। हैदराबाद के स्कूल में उन्होंने पढ़ाया भी है। बाद में मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी से संबंधित गतिविधियों से जुड़ी रहीं। उनका मानना है कि शिक्षा में सुधार के लिए कोई शॉर्टकर्ट रास्ता नहीं होता। अपने ज्ञान और अनुभवों के जरिये वे दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए जी-जान से जुटी थीं। सलाहकार के पद से उन्हें हटा तो दिया गया, लेकिन उम्मीद है कि उनकी पहल का नतीजा आगे भी बेहतर तस्वीर दिखायेगा। दिल्ली में शिक्षा की तस्वीर पहले से तो काफी बदली है, आगे भी इसमें सुधार दृष्टिगोचर होगा। वैसे भी बदलावों के नतीजे तुरंत कम दिखते हैं। इंतजार करना होता है।

पहले थीं हजार कमियां

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जज्बा हो, तो हर काम संभव हो जाता है। आम आदमी पार्टी की सरकार ने सत्ता में आते ही यह इच्छा जतायी थी कि शिक्षा क्षेत्र का कायाकल्प होना चाहिए। उसने यह बीड़ा उठाया और बहुत हद तक इसमें कामयाब रही। उसका प्रयास जारी है और नि:संदेह अगर प्रयास इसी गति और मेहनत से जारी रहे, तो नतीजे आगे और अच्छे आयेंगे। इसके उलट पहले की सरकारों ने न तो इस दिशा में बदलाव की कोई सोच बनायी और न धरातल पर किसी  योजना को उतारने का काम किया। जैसे चल रहा है, चलना चाहिए- इसी ढर्रे पर चीजें चलती रहीं। शिक्षकों की कमी बरकरार रही, प्रशिक्षण का अभाव रहा, शिक्षक-छात्र के अनुपात पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया, बुनियादी समस्याएं यथावत रहीं। और तो और शिक्षकों पर अनावश्यक काम के बोझ को कम करने की कोशिश भी नहीं की गयी। 2014 तक तो दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आधे से अधिक शिक्षक गेस्ट टीचर के रूप में थे। प्राथमिक स्कूलों में 2010 से बहाली ही नहीं हुई थी। गेस्ट टीचर्स के कान्ट्रैक्ट हर साल 10 महीने के लिए फिर से नये कर दिये जाते थे। गर्मी के छुट्टी के दो महीनों में इन्हें वेतन नहीं दिया जाता था। कई क्लासेज में छात्र-शिक्षक अनुपात 125:1 का था। स्कूलों में साफ-सफाई की हालत दयनीय थी। बच्चे स्कूल को कैदखाना समझते थे। उन्हें बीमार होने का डर होता था। कई स्कूल तंग गलियों में बुरी स्थिति में चलते थे। किसी क्लास में 60 बच्चे होते थे, तो कहीं बमुश्किल 15 बच्चे। क्लासरूम से लेकर फर्नीचर और शौचालय से लेकर कॉरिडोर, ऐसी हालत कि उबकाई आती थी। फलत: शिक्षा के मंदिरों की हालत बद से बदतर होती चली गयी। शिक्षा का स्तर तो चौपट हुआ ही, छात्रों का भविष्य भी चौपट होता गया।

यह सच है कि दिल्ली सरकार ने केवल सरकारी स्कूलों पर ही ध्यान नहीं दिया है, बल्कि पूरी दिल्ली के शिक्षा परिदृश्य पर बारीकी से नजर डालते हुए उसमें सुधार की पहल की है। प्रदेश के सभी स्कूलों की ग्रेडिंग का कदम उठाने के साथ ही उसने प्राइवेट स्कूलों को भी व्यावसायिक संस्थान के रूप में बने रहने पर दोबारा सोचने को मजबूर किया है। गौरतलब है कि दिल्ली पहला ऐसा राज्य बना, जहां प्राइवेट स्कूल से फीस का रिफंड कराया गया। प्रोस्पेक्टस के लिए मोटी रकम लेने की परिपाटी बंद करायी गयी। पहले इसके लिए जहां हजारों रुपये वसूले जाते थे, अब वह 100 रुपये के आंकड़े पर आ गया है। बाकायदा सरकार ने इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। पब्लिक स्कूलों में मानकों के पालन के लिए भी सख्त कदम उठाये गये। चाहे वह ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत दाखिला हो, चाहे फीस वृद्धि हो, शिचा का अधिकार कानून या कुछ और।

‘आप’ का अच्छा काम: संतोष त्रिवेदी, शिक्षक, दिल्ली सरकार

दिल्ली सरकार के शिक्षक संतोष त्रिवेदी भी मानते हैं कि सरकारी स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली में नवीन कार्य हो रहे हैं। वे कहते हैं ‘दिल्ली सरकार लगातार शिक्षा के क्षेत्र में नये प्रयोग कर रही है। सभी सरकारी स्कूलों में बुनियादी संरचना ठीक करने के साथ-साथ निजी स्कूलों की मनमाने ढंग से फीस-वृद्धि पर भी रोक लगायी। स्कूलों की ग्रेडिंग का कदम उठाया, जिससे सरकार, निकाय एवं निजी संस्थाओं द्वारा संचालित विद्यालयों की नियमित गुणवत्ता की जांच संभव होगी। इससे सुधार को लेकर उनमें आपसी स्पर्धा भी बढ़ेगी और शैक्षिक परिदृश्य और बेहतर होगा। कह सकते हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए दिल्ली सरकार की गंभीरता सराहनीय है।

 

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